शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

सौर तंत्र 3


सौर मगों में शैव-शाक्त तंत्र की स्वीकृति क्यों?

बचपन से ही मैं विद्वानों एवं बुजुर्गों से सुनता रहा कि मग सूर्यवंशी हैं, सूर्य पूजक हैं और ज्योतिष के ज्ञाता हैं । साथ ही यह भी कि मग सभी प्रकार के तंत्र विद्याओं में दक्ष लोग हैं। बाद में पता चला कि आर्युवेद भी तो तंत्र के अन्तर्गत आता है।
उदाहरणों में सुनता था फलाँ, फलाँ मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, विद्वेषण, स्तंमन आदि कर्मा में  प्रवीण हैं। कुछ लोग इनका काट जानते हैं और लोगों की रक्षा करते हैं। विष चिकित्सा के मामले मग कम चर्चित हैं।
तपस्या, योग बल, वेद ज्ञान, न्यायादि शास्त्रों में दक्षता आदि की चर्चा थी पर बहुत कम। मेरे प्रपितामह ने सांख्य, वेदांत एवं साहित्य में तीर्थ (एम.ए) किया लेकिन फिर रोजी-रोटी के लिए आयुर्वेद पढ़ा और वैद्य रूप में ही बिना डिग्री प्रतिष्ठा पाई। मेरे मन में सवाल उठता रहा कि आखिर सूर्य पूजकों की ज्योतिष में रुचि ओैर दक्षता तो समझ में आती है किंतु इनकी बड़ी संख्या शाक्त-शैव तंत्र का वाहक कैसे बनी? ये आयुर्वेद में कैसे घुसे? कुछ लोग अमीर मैदानी भागवाले सूर्यमंदिरों से जुड़े हुए, कुछ गाँवों के पुरोहित, गुरु वगैरह ऐसा क्यों? काली-दुर्गा आदि को छोड़िए, प्रायः यक्ष-यक्षिणियों के भी ये पुजारी हैं। केवल दक्षिण मार्गी ही नहीं वामाचारी, वाममार्गी, कौलाचारी, सुदूर घने जंगलों में बसे लोग और सभी प्रायः वाममार्गी शाक्त। ये क्र क्या रहे थे?
आधे से अधिक ही नहीं लगभग 2 तिहाई पुरों के कुलदेवी-देवता शाक्त परंपरा की देवियाँ सिद्धेश्वरी, परमेश्वरी, तारा आदि, कुछ सूर्य के विग्रह, अपवाद स्वरूप नृसिंह, वराह आदि।
ये शैव या शाक्त साधना में भी किसी संप्रदाय के अनुयायी न होकर पूरी विविधता को अपनाए हुए हैं। एवं संप्रदाय प्रवर्तित मंदिरों या सिद्ध पीठों पर इनका अधिकार नहीं है फिर भी राज्याश्रय वाले या निजी मंदिरों की ही इतनी प्रतिष्ठा है कि आम आदमी सिद्ध पीठ की भाँति दौड़ा जाता है।
इस भेद को जानने के लिए सौर तंत्र एवं शैव-शाक्त तंत्र के भेद को जानना होगा। सौर तंत्र में संपूर्ण ब्रह्मांड की गतिविधियों का ज्ञान अर्जित किया जाता है। सौर तंत्र पर विस्तार में बाद में लिखा जाएगा, अभी मूल अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए बाह्य आचार में दो काम किए जाते हैं- खगोल का अध्ययन एवं अन्य जीवों की कार्य प्रणाली से सूर्य के संबंधों की अनुभूति परक व्याख्या।
आभ्यंतर आचार में - प्राणायाम, पंचाग्नि साधना एवं इड़ा नाड़ी की दीप्ति के साथ सूर्य मंडल की साधना। गणित तथा ध्यान विधि द्वारा सूर्य मंडल की अनुभूति परक समझ तथा उसका लोक कल्याण में उपयोग। यह साधना अत्यंत कठोर होने पर भी चित्त के सूक्ष्म संस्कारों को न तो भेदने वाली होती थी न जन्म जन्मांतर के रहस्यों को आनंद पूर्वक खोलने वाली। इसमें मध्यमा या सुषुम्ना नामक नाड़ी की प्रधानता नहीं थी।
शैव-शाक्त साधना जो कुंडलिनी साधना है या जिसे बौद्ध मत में चित्तुत्पाद कहा जाता है या अन्य नाम दिए जाते हैं उसमें चेतना एवं मन की विभिन्न अवस्थाओं एवं स्वरूपों पर एकाग्रता कर साक्षात्कार किया जाता है। इस साधना में मंत्र, औषधि, रसायन तथा भोग के अन्य साधन भी नियमपूर्वक ही सही स्वीकृत तो हैं ही। इस प्रकार कुछ मामलों में तुरंत लाभकारी और सूक्ष्म स्तर पर चेतना की अनंत गहराइयों में ले जाने वाली होती है। ऐसी साधना विधि के प्रकाश में आते  ही जब पूरे समाज में इसकी चलन शुरू हुई तो मगों ने भी इस विधि को बढ़-चढ़कर अपनाया साथ ही सूर्यपूजा को भी जारी रखा और ज्योतिष को भी। इतना ही नहीं दैव या भाग्य रूपी सफलता-विफलता के कारक के पूर्वानुमान एवं विभिन्न अनुष्ठानों के लिए शुभाशुभ मुर्हूत के भी सिद्धांत प्रतिपादित किए।
समयाचार अर्थात सामाजिक रूप से स्वीकृत कर्मकांड में तंत्र तथा ज्योतिष की अनेक बाते समन्वित कर ली गई हैं। इसीलिये सांब पुराण तो सूर्यप्रधान है परंतु सौर पुराण में सूर्य का भी अंतर्भाव शिव में कर दिया गया है। मगध में अनेक विष्णु मंदिरों की प्रतिमा को तोड़ कर या हटा कर वहां शिवलिंग या सूर्य की प्रतिमा स्थापित कर दी गई है, जिसकी पहचान मंदिर की मूल वास्त संरचना से हो जाती है। कोंच, देव पड़सर, देव एवं उमगा जिला - औरंगाबाद सभी जगहों का हाल एक है।

गुरुवार, 10 मई 2012

सौर तंत्र


सौर तंत्र
            मग ब्राह्मण अपने को सूर्य से उत्पन्न मानते हैं। सूर्योपासना की विधि के लिये ही सांब ने उन्हें शाकद्वीप से जंबुद्वीप में लाया और वे यहाँ आकर बस गये। इस कथा को तो लगभग सभी जानते हैं परंतु वह विद्या क्या थी, जिसके लिये उन्हें यहां लाया गया, उसी मूल बात को लोग भूल गये हैं।
            तांत्रिक होने का दावा तों कई लोग करते हैं किंतु मग अगर सूय्र तंत्र या सौर तंत्र के जानकार न हों तो बात बनती नहीं हैं। दूसरे लोग तो मगों को सोर तंत्र का विशेषज्ञ होने की बात कह कर और सौर तंत्र की व्याख्या की जिम्मेवारी मगों पर डाल कर काम चला सकते हैं परंतु मग ब्राह्मणों को तो इसकी जानकारी देने ही होगी।
            बिहार में बिहार योग विद्यालय मुंगेर योग एवं तंत्र साधना का अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त संस्था है। इसके वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने सौर तंत्र पर दिनांक 4 मई से चल रहे संत्संग में सौर तंत्र पर जानकारी देते हुए स्वीकार किया कि भारत में सांब के समय से मग ब्राह्मणों ने सूर्योपासना को भारत में प्रचलित किया।
            ऐसा सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है कि लोग सम्मान का भाव रखते हैं लेकिन बात इससे बनने वाली नहीं है। मग ब्राह्मणों में से जो जानकार लोग हैं उन्हें इस चुनौती का सामना करते हुए सौर तंत्र पर विस्तृत प्रकाश डालना चाहिये साथ ही कुछ लोगों को इस दिशा में आगे आकर विद्या भी सीखनी चाहिये।
            अभी जो लोग अपने को तंत्र का जानकार होने का दावा करते हैं वे भी अपने को प्रायः शैव या शाक्त परंपरा का ही अनुयायी मानते हैं। कुछ लोग तो प्रायः निषिद्ध माने जानेवाले षट्कर्म - मारण, मोहन, उच्चाटन वशीकरण आदि का ही विशेषज्ञ घोषित कर धनोपार्जन में लगे रहते हैं। सौर तंत्र के स्थान पर शैव या शाक्त तंत्र को अपनाने की बात कोई नई नहीं है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इस बात की भी पड़ताल जरूरी है।
            मैं इस गुत्थी को समझने में पिछले 20 वर्षों से लगा हुआ हूं। घीरे-धीरे कुछ बाते समण् में आ रही हैं। मैं उन्हें सामने ला रहा हूं। आप सभी मग ब्राह्मणों में से जो सौर तंत्र के जानकार लोग हैं उन्हें भी यह काम अपने स्तर से करना चाहिये।
            इस पोस्ट से यह काम शुरू हो रहा है। आगे क्रमशः जानकारियां दी जायेंगी।
मुख्य विषय होंगे-
1          मग ब्राह्मणों में कितने अभी भी सौर हैं। उन्हें कैसे पहचानें?
2          सौर तंत्र का मतलब?
3          सौर तंत्र और अन्य तंत्र में मुख्य अंतर
4          सौर तंत्र की मुख्य पुस्तकें
5          सौर तंत्र का अंतर्भाव करने का चक्कर
6          बिहार के असली-नकली सूर्य मंदिर (वास्तु के अनुसार)
7          समयाचार एवं स्मार्त पंरपरा में सौर तंत्र का समावेश
8          सौर तंत्र साधना की आंतरिक एवं बाह्य प्रक्रियाएँ

कृपया अपनी जानकारी एवं सुझाव से अवश्य मदद करें।
अगला पोस्ट होगा-

मग ब्राह्मणों में कितने अभी भी सौर हैं। उन्हें कैसे पहचानें?

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

आयोग के सदस्यों का पूरा विवरण As per RTI


गरीब सवर्णाें के लिये बने आयोग के बारे में पूर्णिया से श्री राजेन्द्र कुमार पाठक ने जानकारी भेजी है।
सदस्यों का पूरा विवरण

बुधवार, 25 जनवरी 2012

आगामी सूर्य सप्तमी का उपहार: सांब पुराण का मूल पाठ

प्रिय मित्रगण,

शुभ संयोग से श्री शशिरंजन मिश्र ने सांब पुराण का लिंक भेजा है। उस लिंक से आप सांब पुराण डाउन लोड कर पढ़ सकते हैं बशर्ते आपको मूल संस्कृत सामग्री को पढ़ने-समझने की क्षमता हो। यहां इस सामग्री को निःशुत्क नेट पर उपलब्ध कराने वाले सभी लोगों के प्रति आभार एवं कृतज्ञता के साथ यह सामग्री दी जा रही है।
http://www.dharmicscriptures.org/scriptures.htm
http://www.dharmicscriptures.org/samba_purana.pdf
सांब पुराण मगों की जातीय पहचान वाला उप पुराण है। इसी के संदर्भों को अनेक विद्वान उद्धृत करते हैं। अब यह मूल रूप में ही प्रस्तुत है। इसमें वर्णित सौर तंत्र एवं शैव-शाक्त तंत्र संबंधी सामग्री का कैसे उपयोग अपने जीवन में कर सकते हैं इस विषय पर बाद में लिखा जायेगा।

ब्लाग लेखक

सोमवार, 2 जनवरी 2012

आयोग के सदस्य

आयोग के सदस्य

मित्रों,
बिहार सरकार ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के लिए आयोग का गठन कर दिया है और विभिन्न प्रमंडलों में सूचना/विचार संग्रह करने हेतु आयुक्त/पदाधिकारियों की नियुक्ति भी कर दी है।
आरंभिक जनकारी के अनुसार----
माननीय जस्टिस बी के त्रिवेदी - अध्यक्ष 04515152086
इंजी. नरेन्द्र कुमार सिंह - सदस्य 993163095 कोशी एवं पूर्णिया प्रमंडल के लिये
श्री कृष्ण सिंह - सदस्य मुंगेर प्रमंडल हेतु
श्री संजय मयूख - सदस्य
मुहम्मद अब्बास - सदस्य
सदस्यों का कार्य क्षेत्र बदल भी सकता है।

गांधी स्मारक के सामने गांधी मैदान, पटना में धरने पर


गांधी स्मारक के सामने गांधी मैदान, पटना में एक दिन के उपवास-धरने पर बैठे श्री श्यामनंदन मिश्र एवं अन्य
इसी दिन औरंगाबाद, बिहार में जनता दरबार में मुख्य मंत्री से मिल कर शाकद्वीपी ब्रहा्मणों को आरक्षण देने के लिये श्री गुप्तेश्वर पाठक ने स्माार पत्र दिया