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रविवार, 5 अक्टूबर 2014
बुधवार, 9 जनवरी 2013
शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज, परिवार मिलन समारोह, गया नगर
स्थान-प्रकृति वाटिका, खटकाचक, दिनांक- 23 दिसंबर 2012, दिन रविवार
परिवार मिलन कार्यक्रम के आमद खर्च का व्योरा
पहले तो इस मिलन कार्यक्रम को पूरी तरह विकेन्द्रित सहयोग पद्धति पर आधारित कर मनाने का निर्णय हुआ था लेकिन संज्ञा समिति के लोगों एवं अन्य के प्रस्ताव पर लगभग पूर्ण बहुमत से 5 सदस्यों की संयोजन समिति के नियंत्रण में आपसी चंदे पर मनाने का निर्णय हुआ। समिति के संदस्य चुने गये- 1 सर्व श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र, खरखुरा, इस समिति के संयोजक चुने गये। सदस्य गण- 2 कमल पाठक, खरखुरा 3 देवेन्द्र कुमार पाठक, अघ्यक्ष संज्ञा समिति,
4 राजंेश कुमार मिश्र, बागेश्वरी, 5 डॉ प्रमोद कुमार पाठक। तुरत वहीं पर चंदा आया-.......................।
1 सर्व श्री राधामोहन मिश्र 255
2 संजय कुमार मिर 101
3 उपेन्द्र कुमार पाठक 101
4 कमल पाठक 500
5 मजोज कुमार मिश्र 500
6 राजकुमार वैद्य 251
7 बैद्यनाथ मिश्र 251
8 अरुंजय कुमार पाण्डेय 101
9 अशोक कुमार मिश्र 151
10 गिरिजानंदन मिश्र 101
11 हरिनारायणमिश्र 501
12 प्रमोद कुमार पाठक 151
13 अंनंत कृष्ण 100
14 प्रमोद मिश्र 055
15 अमित कुमार मिश्र 251
16 राजेश कुमार मिश्र 251
17 रवीन्द्र मिश्र 151
18 अमृतेश कुमार मिश्र 501
19 देवेन्द्र नाथ मिश्र 500
कुल 4777.00 इसे श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र को सौंपा गया।
दिनांक 4 जनवरी को बैठक हुई। इसमें प्रस्तुत विवरण निम्न है-
1 कुल फुटकर चंदा रु 4777 एवं 816
2 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक रु 2000
कुल. रु 7589
परिवार मिलन कार्यक्रम के दिन प्राप्त राशि
1 सर्व श्री राजंेन्द्र कुमार पाठक 200
2 अमृतेश कुमार मिश्र 100
3 धनंजय पाठक 011
4 बाल शशि मिश्र 101
5 संजय कुमार मिश्र 101
6 रमाकांत पाठक 050
7 मुरारि मिश्र 101
8 ब्रजभूषण पाण्डेय 101
9 चंदन कुमार मिश्र 051
कुल 816.00
रमेश कुमार पाठक बैंगन 20 किलो
श्री देवेन्द्र कुमार पाठक ने घोषणा की थी कि चंदे के बाद जो भी घटेगा उसकी भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे। स्थान व्यवस्था एवं अन्य खर्च (भोजन के अतिरिक्त) में चंदे से शेष की भरपाई रवीन्द्र कुमार पाठक करेंगे।
खर्च
क डॉ प्रमोद कुमार पाठक एवं संज्ञा समिति मंडली द्वारा लिट्टी आदि भोजन मद में रु 11480 ( विवरण अनुपलब्ध)
ख श्री मनीष मिश्र द्वारा माइक स्पीकर बैटरी आदि मद में रु 740
ग श्री प्रभात कुमार पाण्डेय, प्रतिनिधि र.कु.पाठक चाय, फलाहार, प्लेट, ग्लास, आदि
फुटकर सामग्री मद में प्रस्तुत विवरण के अनुसार रु 1140
कुल रु 13360
1 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक चंदे के बाद घटी राशि रु 5771 की भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे।
2 श्री रवीन्द्र कुमार पाठक द्वारा अन्य मद की राशि रु 740 की भरपाई निजी तौर पर कर दी गई।
स्थान सहयोग रवीन्द्र कुमार पाठक, बस सहयोग देवेन्द्र कुमार पाठक निजी खर्च पर, व्यवस्थापकों द्वारा पेट्रोल खर्च
इस पेज की 40 प्रतियां बना कर सक्रिय सदस्यों में वितरित की गईं और इसे magasamskriti.blogspot पर सार्वजनिक कर दिया गया।
रवीन्द्र कुमार पाठक, दिनांक 06.जनवरी .2013
स्थान-प्रकृति वाटिका, खटकाचक, दिनांक- 23 दिसंबर 2012, दिन रविवार
परिवार मिलन कार्यक्रम के आमद खर्च का व्योरा
पहले तो इस मिलन कार्यक्रम को पूरी तरह विकेन्द्रित सहयोग पद्धति पर आधारित कर मनाने का निर्णय हुआ था लेकिन संज्ञा समिति के लोगों एवं अन्य के प्रस्ताव पर लगभग पूर्ण बहुमत से 5 सदस्यों की संयोजन समिति के नियंत्रण में आपसी चंदे पर मनाने का निर्णय हुआ। समिति के संदस्य चुने गये- 1 सर्व श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र, खरखुरा, इस समिति के संयोजक चुने गये। सदस्य गण- 2 कमल पाठक, खरखुरा 3 देवेन्द्र कुमार पाठक, अघ्यक्ष संज्ञा समिति,
4 राजंेश कुमार मिश्र, बागेश्वरी, 5 डॉ प्रमोद कुमार पाठक। तुरत वहीं पर चंदा आया-.......................।
1 सर्व श्री राधामोहन मिश्र 255
2 संजय कुमार मिर 101
3 उपेन्द्र कुमार पाठक 101
4 कमल पाठक 500
5 मजोज कुमार मिश्र 500
6 राजकुमार वैद्य 251
7 बैद्यनाथ मिश्र 251
8 अरुंजय कुमार पाण्डेय 101
9 अशोक कुमार मिश्र 151
10 गिरिजानंदन मिश्र 101
11 हरिनारायणमिश्र 501
12 प्रमोद कुमार पाठक 151
13 अंनंत कृष्ण 100
14 प्रमोद मिश्र 055
15 अमित कुमार मिश्र 251
16 राजेश कुमार मिश्र 251
17 रवीन्द्र मिश्र 151
18 अमृतेश कुमार मिश्र 501
19 देवेन्द्र नाथ मिश्र 500
कुल 4777.00 इसे श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र को सौंपा गया।
दिनांक 4 जनवरी को बैठक हुई। इसमें प्रस्तुत विवरण निम्न है-
1 कुल फुटकर चंदा रु 4777 एवं 816
2 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक रु 2000
कुल. रु 7589
परिवार मिलन कार्यक्रम के दिन प्राप्त राशि
1 सर्व श्री राजंेन्द्र कुमार पाठक 200
2 अमृतेश कुमार मिश्र 100
3 धनंजय पाठक 011
4 बाल शशि मिश्र 101
5 संजय कुमार मिश्र 101
6 रमाकांत पाठक 050
7 मुरारि मिश्र 101
8 ब्रजभूषण पाण्डेय 101
9 चंदन कुमार मिश्र 051
कुल 816.00
रमेश कुमार पाठक बैंगन 20 किलो
श्री देवेन्द्र कुमार पाठक ने घोषणा की थी कि चंदे के बाद जो भी घटेगा उसकी भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे। स्थान व्यवस्था एवं अन्य खर्च (भोजन के अतिरिक्त) में चंदे से शेष की भरपाई रवीन्द्र कुमार पाठक करेंगे।
खर्च
क डॉ प्रमोद कुमार पाठक एवं संज्ञा समिति मंडली द्वारा लिट्टी आदि भोजन मद में रु 11480 ( विवरण अनुपलब्ध)
ख श्री मनीष मिश्र द्वारा माइक स्पीकर बैटरी आदि मद में रु 740
ग श्री प्रभात कुमार पाण्डेय, प्रतिनिधि र.कु.पाठक चाय, फलाहार, प्लेट, ग्लास, आदि
फुटकर सामग्री मद में प्रस्तुत विवरण के अनुसार रु 1140
कुल रु 13360
1 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक चंदे के बाद घटी राशि रु 5771 की भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे।
2 श्री रवीन्द्र कुमार पाठक द्वारा अन्य मद की राशि रु 740 की भरपाई निजी तौर पर कर दी गई।
स्थान सहयोग रवीन्द्र कुमार पाठक, बस सहयोग देवेन्द्र कुमार पाठक निजी खर्च पर, व्यवस्थापकों द्वारा पेट्रोल खर्च
इस पेज की 40 प्रतियां बना कर सक्रिय सदस्यों में वितरित की गईं और इसे magasamskriti.blogspot पर सार्वजनिक कर दिया गया।
रवीन्द्र कुमार पाठक, दिनांक 06.जनवरी .2013
गुरुवार, 22 नवंबर 2012
ज्ञानामृत
मित्रों,
ज्ञानामृत एक
कार्यक्रम का नाम है। अभी यह प्रशिक्षण शिविर के रूप में चलाया जायेगा। बाद में
जैसा लोगों का विचार होगा, निर्णय लिया जायेगा। यह कार्यक्रम
बहुलतावादी सनातन धर्म परंपरा के आधार पर चलेगा, किसी संप्रदाय या
पथ विशेष के आधार पर नहीं।
स्वरूप -
यह शिविर मूलतः आवासीय होगा। प्रशिक्षण शिविर वाले गाँव के लोगों, एवं वहां
के सभी प्रतिभागियों को घर पर रहने की छूट दी जायेगी।
मुख्य विषय
-
प्राथमिक
स्तर - जीवनोपयोगी धार्मिक, सांस्कृतिक आचार
विचार के विषय होंगे - जैसे - आसन, प्राणायाम, स्तोत्र
पाठ, संध्या (आरंभिक), गायत्री, व्रत-उपवास
के तौर-तरीके, पंचाग का दैनिक जीवन में उपयोग, धर्मशास्त्र की
आरंभिक समझ, गृहस्थ जीवन, बच्चों की एकाग्रता, स्वास्थ्य
रक्षा के सरल सूत्र।
द्वितीय
स्तर - मंत्र, जप, होम, संस्कार, मुद्रा, बंध, हठयोग के
उच्च अभ्यास, न्यास, संध्या संपूर्ण, योगनिद्रा, छोटे-छोटे
याग/यज्ञ, पंचांग के अन्य उपयोग, धर्मशास्त्र की
परंपरा एवं मगध क्षेत्र, मूर्तियों/मंदिरांे का वास्तुशिल्प, विभिन्न
संप्रदाय एवं स्मार्त धर्म के साथ संबंध, चार पुरुषार्थों को
गृहस्थ जीवन में प्राप्ति के मूल सूत्र, आचार भेद।
तृतीय स्तर
- दो स्तरों तक प्रशिक्षण पाने वाले प्रतिभागी इतने सक्षम हो जाएंगे कि आगे
के लिए वे अपनी रुचि एवं पात्रता के अनुरूप गुरु खोज सकें और उनके मार्गदर्शन में
उच्च स्तरीय साधना कर सकें। इस स्तर पर मग मित्र मंडल की कोई भूमिका नहीं होगी।
गुरु शिष्य के बीच सीधा संबंध होगा।
प्रतिभागी
- 12 साल से ऊपर का कोई भी सनातन धर्म परंपरा वाला व्यक्ति
प्रतिभागी हो सकता है। कट्टर वैष्णव, शैव, शाक्त आर्य
समाजी या अन्य आधुनिक संप्रदाय या पंथ के लोगों के लिए यहाँ कलह के अतिरिक्त कुछ
नहीं है। अतः वो नहीं आयें तो अच्छा क्योंकि हम किसी भी आधुनिक गुरु को एकमात्र
प्रामाणिक व्यक्ति मात्र कर कार्यक्रम नहीं चला रहे।
लड़कियों
एवं महिलाओं केा तभी सम्मिलित किया जा सकेगा जब स्त्री प्रशिक्षिका उपलब्ध होगी।
सामान्य सत्रों में सबका निर्वाध प्रवेश होगा, जो मगों के साथ
मैत्री भाव रखते हैं। एैसा करना सामाजिक समर्थन के लिये जरूरी है तभी आचारी एवं
अर्जकों से रक्षा हो सकेगी।
हमारी मूल
समस्या एवं समाधान का मार्ग
1. सनातन धर्म विविधताओं एवं समन्वय से
भरा हुआ है। अनेकता में एकता है लेकिन समन्वय एवं एकता के सूत्रों को पहचाना जरूरी
है। ज्ञानामृत में उसे खोजने एवं दूसरों को बताने का प्रयास जारी रहेगा।
2. धर्म के विभिन्न पक्ष हैं। कोई भी
व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं है अतः जो जिस विषय का जानकार है वह अगर अपने ज्ञान-भंडार से
दूसरे को लाभान्वित करे तो सबका ज्ञान भंडार बढ़े। इसीलिए यह प्रयास किसी एक
व्यक्ति के ज्ञान भंडार पर आधारित न हो कर पारस्परिक आदान-प्रदान पर आधारित होगा।
3. इस प्रयास में केवल दार्शनिक
तत्त्ववाद या देवी-देवताओं की कथा या लीला की चर्चा को सम्मिलित न कर जीवनपयोगी
व्यावहारिक, प्रायोगिक विषयों को चुना गया है, जिनका सामूहिक
आचार में अभ्यास भी कराया जा रहा है। कक्षा प्रवचन, प्रश्नोत्तर या
सत्संग, शिविर के दौरान या बाद में आचरण संबंधी विषयों पर ही मान्य
हैं, अन्यथा नहीं। वैसी कथा तो समाज में बहुत हो रही है।
4. दो चरणों में मूलभूत बातों का
प्रशिक्षण दिया जायेगा। आगे की गुरु-शिष्य परंपरा के लिए सभी स्वतंत्र हैं अतः
किसी एक को गुरु मानने की अनिवार्यता नहीं है। उस मामले में हमारी दखलंदाजी नहीं
होगी। हाँ उसके पहले शिविर स्तर तक सभी आचार्यौ का आदर एवं श्रद्धा जरूरी है।
धर्म के कई
पक्ष एवं स्तर हैं। मैंने सुविधा के लिए उसका वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है -
स्तर भेद -
सामाजिक
परंपरा का निर्वाह - अनेक लोग बिना सोचे समझे, बिना लाभ-हानि का
विचार किए, जैसे-तैसे धार्मिक कृत्यों को पूरा करते हैं एवं जजमान की
रुचि के अनुसार केवल औपचारिकता पूरी कराने का काम पुरोहित कराते हैं। यह मजबूरी
वाला एवं ऊटपटांग काम है, अतः इसे सीखने-सिखाने की बात ही व्यर्थ
है।जो लोग सामाजिक परंपरा की धर्म के अन्य स्तरों एवं पक्षों से संगति बनाकर कार्य
कराते हैं, उनके आचरणीय विषयों को सीखा तथा सिखाया जायेगा।
समाज
व्यवस्था संबंधी प्रावधान - धर्म की अनेक बातें समाज व्यवस्था वाली
हैं। वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, रोजगार, जजमानी
प्रथा आदि। इनकी चर्चा एवं सैद्धान्तिक जानकारी तो दी जाएगी, उससे अधिक
नहीं क्योंकि हम न तो राज्य सत्ता वाले हैं न धर्म सत्ता वाले। यह हमारे
क्षेत्राधिकार के बाहर है।
भारतीय
संविधान एवं कानून ही हमारे भी कानूनी ग्रंथ हैं। किसी भी जाति विशेष का
वर्चस्वकारी प्रयास उचित नहीं है। शेष, समाज को तय करना है
कि क्या कालोचित है क्या कालबाह्य?
अध्यात्म
(अर्थात् योग, तंत्र, साधना, उपासना संबंधी
बातें) तन एवं मन तथा इन दोनों का समाज एवं प्रकृति से संबंध को जानना तथा समाज
एवं प्रकृति के साथ बेहतर संबंध बनाने की अनेक विधियाँ आज स्वास्थ्य सुधार, तनाव
मुक्ति के उपाय, एकाग्रता बढ़ाने के उपाय जीर्ण रोगों को दूर भगाने, बुद्धि
बढ़ाने के उपाय, स्मरण शक्ति बढ़ाने से लेकर बेहतर यौन सुख एवं तृिप्त के उपाय
के रूप में विभिन्न नामों से अनेक योगा’ ‘तंत्रा’ वाली
संस्थाओं द्वारा प्रयोग में लाई जा रही हैं।
ऐसी
व्यवस्थाएँ योग, तंत्र, साधना के उपायों को नए समाज के अनुरूप भाषा
एवं शैली में प्रस्तुत कर रही हैं। हम इन विषयों एवं विधियों के प्रशिक्षण के
समर्थक हैं। इनकी आरंभिक शिक्षा एवं मूल विधि से परिचय तक का काम शिविर में कराया
जा सकता है। इस स्तर के कार्यों एवं विषयों की सूची बहुत लंबी है, जैसे -
व्रत, पर्व, उत्सव, संस्कार यज्ञ, देवार्चन
आदि।
उक्त
विषयों के प्रायोगिक अभ्यास हेतु मध्यम स्तर के ज्योतिष, संस्कार
ग्रंथ, पंचांग निर्णय, यंत्र, मन्त्र
शास्त्र, कर्मकांड, स्तोत्र, यंत्र, तंत्र, मंत्र उनका
अर्थ निकालना एवं कागज या बेदी पर उकेरना, रंगों का प्रभाव
आदि का ज्ञान होना जरूरी है। इनके साथ, ध्वनि, स्वर, मंत्रों के
संकलन वाले ग्रंथ, जैसे- मंत्रमहोदधि आदि से सुपरिचित होना भी
जरूरी है।
शिविरों के
मूल विषय उपर्युक्त में से हीं होगें, जिनका विस्तृत
विवरण शिविरों के पाठ्यक्रम में रहेगा।
अतीन्द्रिय
अनुभव संबंधी - तन, मन एवं बुद्धि आधारित अनुभवों से उठकर आत्मा
या परमात्मा, ईश्वर साक्षात्कार आदि विषय अत्यंत सूक्ष्म एवं गंभीर हैं।
इनमें अपने मन के सारे भावों को गुरु के समक्ष खोलकर रखना पड़ता है। इसलिए इस स्तर
की बातें केवल गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही होनी चाहिए। ध्यान, मंत्रसाधना, चक्रपूजा
आदि विषय इस केाटि के अंतर्गत आते हैं। इसी प्रकार छोटी बड़ी सिद्धि या साधना वाली
बातें भी हैं।
विभिन्न
विद्याओं के उच्चस्तरीय ज्ञान संबंधी-
आत्म कल्याण, लोक कल्याण एवं मोक्ष सभी विद्याओं का
लक्ष्य है। मोक्ष में ही सभी सहायक हैं।
अतः ज्योतिष, आयुर्वेद, तंत्र, ध्यानयोग, आदि के
उच्च अभ्यास गुरु परंपरा से तन्मयतापूर्वक
सीखने की बातें हैं।
मग-मित्र मंडल
मग-मित्र
मंडल - मग-मित्र मंडल ज्ञानामृत कार्यक्रम के प्रसार एवं इन शिविरों के आयोजन एवं
संचालन करने वाले लोगों के संगठन का नाम है।। इनमें केवल वे लोग ही सम्मिलित होंगे, जिन्हें इन
प्रायोगिक विद्याओं का व्यावहारिक ज्ञान होगा। चूँकि कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं
है अतः सभी के साथ लेने-देने की संभावना है। इस प्रकार प्रशिक्षक/आचार्य स्तर पर
भी ज्ञान से परस्पर अभिवृद्धि की पूरी संभावना है। जो प्रशिक्षणार्थी होंगे उन्हें
भी आत्मीय माहौल में अपनी परंपरा के अनुरूप ज्ञान का लाभ होगा।
आरंभ, सदस्यता
एवं विस्तार - इसकी शुरुआत दो लोगों ने की है, डॉ0 रवीन्द्र
कुमार पाठक एवं श्री श्यामनंदन मिश्रा दोनों की सहमति से श्री पतंजलि मिश्र एवं
श्री चिंतरंजन पाण्डेय को भी सदस्य बनाया गया है। इसी प्रकार आगे भी प्रायोगिक
ज्ञान एवं अभ्यास करने वाले लोगों को ही इस भित्र मंडल में सम्मिलित किया जाएगा
क्योंकि इसका उद्देश्य मुख्यतः विद्या की अभिवृद्धि है।
प्रायोगिक
ज्ञान के तीन स्तर हैं। इनमें से किसी एक स्तर का अनुभवात्मक ज्ञान अनिवार्य है।
एक से अधिक स्तरों का ज्ञान और अच्छा है। नए सदस्य का मित्र मंडल में प्रवेश
सर्वसम्मति से होगा। सर्व सहमति न बन पाने पर अतिथि आचार्य के रूप में किसी भी
प्रायोगिक ज्ञान वाले व्यक्ति को सम्मिलित किया जा सकता है।
अपात्र - किसी एक
संप्रदाय या गुरु परंपरा को प्रामाणिक मानने वाले या स्वयं को ही सभी मामलों में
प्रामाणिक मानने और मनवाने वाले व्यक्ति इस संगठन के लिए अपात्र होंगे भले ही उनका
प्रायोगिक अनुभव किसी भी स्तर एवं स्वरूप का हो।
पात्रता
एवं स्तर भेद -
पहला - केवल
शाब्दिक ज्ञान या शास्त्राध्ययन परंतु कोई अनुभव नहीं, जैसे -
ज्योतिष, दर्शन, धर्म शास्त्र, पुराण आदि का केवल
किताबी ज्ञान।
दूसरा - अनुष्ठान, पूजा-पाठ
की विधियों का ज्ञान परंतु उसका परिणाम से संबंध एवं पूरी प्रक्रिया के अनुभवात्मक
ज्ञान का अभाव, जैसे - संध्या तो करना परंतु तीनों नाड़ियों की गति, प्रकृति से
संबंध, चेतना पर प्रभाव, संतुलन स्थापित
करने के भौतिक तथा मानसिक प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होना। शाब्दिक जप से ऊपर की
जप की प्रणालियों के ज्ञान का अभाव। अर्थात केेवल बाह्य आचार के जानकारी लेकिन
आभ्यंतर प्रक्रिया एवं आचार से अपरिचित।
तीसरा - बाह्य, आभ्यंतर
एवं सामाजिक तीनों स्तरों पर होने वाले प्रभाव का अनुभवात्मक ज्ञान, भौतिक
द्रब्यों का तन एवं मन पर प्रभाव, मंत्र की संरचना की समझ, संध्या
भाषा, कूट भाषा को खोलने की क्षमता, ध्वनि, स्वर, एवं
सामग्री के संयोजन का ज्ञान, मंडल, बेदी, यंत्र, कुंड, आवाहन-पूजन
की समझ आदि के साथ पहले एवं दूसरे स्तर पर वर्णित बातों के साथ संगति मिलाने की
क्षमता। इस स्तर की कुछ बातों का ज्ञान एवं अन्य को सीखने की विनम्रता।
तीसरे स्तर
वाले दुर्लभ साधकों का सहर्ष स्वागत है। दूसरे स्तर वालों का भी स्वागत है इस
अपेक्षा के साथ की वे तीसरे स्तर के लोगों से सीखंे। पहले स्तर वाले भी सम्मिलित
होंगे परन्तु उनके प्रस्ताव को जबतक तीसरे एवं दूसरे स्तर वाले स्वीकार नहीं करते
वह पाठ्यक्रम का भाग नहीं होगा।
स्पष्टीकरण
-
1. लोकरंजन विद्या की कीमत पर नहीं
होगा। विद्या के अनुरूप हीं लोकरंजन हो सकेगा।
2. भीड़ बढ़ाने का महत्व नहीं है। ज्ञान
परंपरा बढ़े यही मुख्य बात है। तुरत प्रचार प्रसार की आशा
दुख देगी।
3. यह कार्यक्रम व्यावसायिक नहीं है, परन्तु इसे
आर्थिक रूप से सुदृढ़ तो करना हीं है तभी लंबे समय तक चल सकेगा।
लाभार्थी -
इस विद्या
के लाभार्थी वे सभी लोग होंगें जो मगों के प्रति मैत्री भाव रखते हों, चाहे
ब्राह्मण हों या अब्राह्मण अथवा स्वयं विद्याधर वंश परंपरा में हों । उनसे लेने
देने का रिश्ता तो चलाना ही होगा या संयुक्त कार्यक्रम भी हो सकते हैं।
मग होने पर
भी जो दूसरे जाति-वर्ग के प्रति समर्पित हों या नव सुधारवादी संप्रदायों में हैं वे
इस मंडल में नहीं आ सकते हैं। इसके अतिरिक्त सारी बातें आपसी
निर्णय से होंगी। आपसी सहमति से ही किसी एक को अध्यक्ष एवं एक को संयोजक चुना
जायेगा।
कार्यकाल - कम से कम
एक साल, उसके बाद मग मित्र मंडल के सदस्यों की इच्छा के अनुरूप।
गुरुवार, 15 नवंबर 2012
मग-मित्र मंडल
मग-मित्र-मंडल, बिहार
मग-मित्र मंडल ज्ञानामृत कार्यक्रम के प्रसार एवं इन
शिविरों के आयोजन एवं संचालन करने वाले लोगों के संगठन का नाम है। इनमें केवल वे
लोग ही सम्मिलित होंगे, जिन्हें इन
प्रायोगिक विद्याओं का व्यावहारिक ज्ञान होगा। चूँकि कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं
है अतः सभी के साथ लेने-देने की संभावना है। इस प्रकार प्रशिक्षक/आचार्य स्तर पर
भी ज्ञान से परस्पर अभिवृद्धि की पूरी संभावना है। जो प्रशिक्षणार्थी होंगे उन्हें
भी आत्मीय माहौल में अपनी परंपरा के अनुरूप ज्ञान का लाभ होगा।
आरंभ, सदस्यता एवं
विस्तार - इसकी शुरुआत दो लोगों ने की है, डॉ0 रवीन्द्र कुमार पाठक एवं श्री श्यामनंदन मिश्रा दोनों की
सहमति से श्री पतंजलि मिश्र एवं श्री चिंतरंजन पाण्डेय को भी सदस्य बनाया गया है।
इसी प्रकार आगे भी प्रायोगिक ज्ञान एवं अभ्यास करने वाले लोगों को ही इस भित्र
मंडल में सम्मिलित किया जाएगा क्योंकि इसका उद्देश्य मुख्यतः विद्या की अभिवृद्धि
है।
प्रायोगिक
ज्ञान के तीन स्तर हैं। इनमें से किसी एक स्तर का अनुभवात्मक ज्ञान अनिवार्य है।
एक से अधिक स्तरों का ज्ञान और अच्छा है। नए सदस्य का मित्र मंडल में प्रवेश
सर्वसम्मति से होगा। सर्व सहमति न बन पाने पर अतिथि आचार्य के रूप में किसी भी
प्रायोगिक ज्ञान वाले व्यक्ति को सम्मिलित किया जा सकता है।
अपात्र -
किसी एक संप्रदाय या गुरु परंपरा को प्रामाणिक मानने वाले या स्वयं को ही सभी मामलों
में प्रामाणिक मानने और मनवाने वाले व्यक्ति इस संगठन के लिए अपात्र होंगे भले ही
उनका प्रायोगिक अनुभव किसी भी स्तर एवं स्वरूप का हो।
पात्रता
एवं स्तर भेद -
पहला -
केवल शाब्दिक ज्ञान या शास्त्राध्ययन पर कोई अनुभव नहीं, जैसे - ज्योतिष, दर्शन, धर्म शास्त्र, पुराण आदि का केवल
किताबी ज्ञान।
दूसरा -
अनुष्ठान, पूजा-पाठ
की विधियों का ज्ञान परंतु उसका परिणाम से संबंध एवं पूरी प्रक्रिया के अनुभवात्मक
ज्ञान का अभाव, जैसे -
संध्या तो करना परंतु तीनों नाड़ियों की गति, प्रकृति से संबंध, चेतना पर प्रभाव, संतुलन स्थापित करने के भौतिक तथा मानसिक प्रक्रियाओं की
जानकारी नहीं होना। शाब्दिक जप से ऊपर की जप की प्रणालियों के ज्ञान का अभाव।
अर्थात केेवल बाह्य आचार के जानकारी लेकिन आभ्यंतर प्रक्रिया एवं आचार से अपरिचित।
तीसरा -
बाह्य, आभ्यंतर
एवं सामाजिक तीनों स्तरों पर होने वाले प्रभाव का अनुभवात्मक ज्ञान, भौतिक द्रब्यों का
तन एवं मन पर प्रभाव, मंत्र की
संरचना की समझ, संध्या
भाषा, कूट भाषा
को खोलने की क्षमता, ध्वनि, स्वर, एवं सामग्री के
संयोजन का ज्ञान, मंडल, बेदी, यंत्र, कुंड, आवाहन-पूजन की समझ
आदि के साथ पहले एवं दूसरे स्तर पर वर्णित बातों के साथ संगति मिलाने की क्षमता।
तीसरे स्तर
वाले दुर्लभ साधकों का सहर्ष स्वागत है। दूसरे स्तर वालों का भी स्वागत है इस
अपेक्षा के साथ की वे तीसरे स्तर के लोगों से सीखंे। पहले स्तर वाले भी सम्मिलित
होंगे परन्तु उनके प्रस्ताव को जबतक तीसरे एवं दूसरे स्तर वाले स्वीकार नहीं करते
वह पाठ्यक्रम का भाग नहीं होगा।
स्पष्टीकरण
-
1. लोकरंजन
विद्या की कीमत पर नहीं होगा। विद्या के अनुरूप हीं लोकरंजन हो सकेगा।
2. भीड़ बढ़ाने
का महत्व नहीं है। ज्ञान परंपरा बढ़े यही मुख्य बात है।
3. यह
कार्यक्रम व्यवसायिक नहीं है, परन्तु इसे आर्थिक रूप से सुदृढ़ तो करना हीं है तभी लंबे समय
तक चल सकेगा।
लाभार्थी -
इस विद्या
के लाभार्थी वे सभी लोग होंगें जो मगों के प्रति मैत्री भाव रखते हों, चाहे ब्राह्मण हों
या अब्राह्मण अथवा स्वयं विद्याधर वंश परंपरा में हांे। उनसे लेने देने का रिश्ता
तो चलाना ही होगा या संयुक्त कार्यक्रम भी हो सकते हैं।
मग होने पर
भी जो दूसरे जाति-वर्ग के प्रति समर्पित हों या नव सुधारवादी संप्रदायों में हांे
वे इस मंडल में नहीं आ सकते हैं। इसके अतिरिक्त सारी बातंे आपसी निर्णय से होंगी।
आपसी सहमति से ही किसी एक को अध्यक्ष एवं एक को संयोजक चुना जायेगा।
कार्यकाल -
कम से कम एक साल, उसके बाद
मग मित्र मंडल के सदस्यों की इच्छा के अनुरूप।
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