शुक्रवार, 8 मार्च 2013


किश्त 3
अध्याय ग्याहर - ग्यारहवें अध्याय में भी मार्तण्ड की वंश परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। और बताया गया है कि संज्ञा की छायापत्नी पृथ्वी और पुनः बडवा (घोड़ी) रूप धारणी संज्ञा के गर्भ से कैसे-कैसे किन-किन देवों एवं नक्षत्रों की सृष्टि हुई। विवश्वान मनु, कालिंदी यम, यमी रूपी युगल और आगे चलकर फिर श्रुतश्रवा मनु, शनिश्चर ग्रह आदि की सृष्टि हुई। कैसे बडवा रूप धारणी छाया के साथ अश्वरूपी मार्तण्ड का शारीरिक संपर्क हुआ एवं अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार यमुना एवं ताप्ती नाम की दो नदियाँ सूर्य के वंश परंपरा में उत्पन्न र्हुइं और किस प्रकार इक्ष्वाकु वंश अस्तित्व में आया। यहाँ तक की कथा सूर्य के अमिट तेज की कथा है, जिसे कोई सहन नहीं कर पा रहा है और सूर्य परिवार में केाई न कोई समस्या विकट रूप से बनी रह रही है। इसके बाद बारहवंे अध्याय से सूर्य के प्रचंड रूप के सरलीकरण की कथा शुरू होती है।
बारहवाँ अध्याय -संज्ञा की पीड़ा को देखकर विश्वकर्मा व्यथित हो जाते हैं और निर्णय करते हैं कि सूर्य की स्तुति करके उन्हें मनाया जाय और अपनी प्रचण्डता को कम करने में श्री सूर्य की मदद ली जाय। सूर्य का स्वरूप अग्नि का गोला पिण्ड है और इसके ताप से संपूर्ण सृष्टि परेशान हो रही है। इसी ताप से रक्षा के लिए अनेक देवता, ऋषि, गंधर्व, अप्सरा एवं देव जातियाँ सूर्य की प्रार्थना करती हैं। और विश्वकर्मा भी धीरे-धीरे सूर्य के प्रचण्ड स्वरूप को सुन्दर एवं सह्य रूप देने का प्रयास करती है। आगे भी स्तुति जारी रहती है। यहाँ से मूर्त्ति निर्माण की आधार भूमि गढ़ी जाती है।
तेरहवां अध्याय - तेरहवें अध्याय में विश्कर्मा द्वारा भगवान भास्कर की स्तुति की जाती है।
चौदहवाँ अध्याय - चौदहवें अध्याय में पुनः ऋषियों द्वारा भगवान सूर्य की स्तुति की गयी है। इसे अध्याय की पुस्पिका में ब्रह्म भाषित स्तुति कहा गया है।
पंद्रहवा अध्याय - पंद्रहवें अध्याय में सुन्दर गेय पदों के द्वारा पुनः भगवान भास्कर की स्तुति की गयी है।
सोलहवां अध्याय - अब तक सूर्य को अदिति की वंश परंपरा के साथ जोड़कर उनकी गौरव गाथा का व्याख्यान किया गया लेकिन जैसा कि हम प्रथम अध्याय की स्थापना में देख चुके हैं आदित्य ब्रह्मा, विष्णु ओर रुद्र इन त्रिदेवों के रूप में हैं। सोलहवें अध्याय में सूर्य के रुद्रात्मक  स्वभाव का वर्णन हुआ है। पहले सूर्य के आसपास रहनेवाले देवताओं जैसे अश्विनी कुमार, कार्तिकेय, गरूड़, चित्रगुप्त आदि का वर्णन हुआ है उसके बाद विशेषकर चित्रगुप्त के माठर और जांटकार नामों का उल्लेख हुआ है। माठर शब्द की निष्पत्ति भी बतायी गयी है। और तदनंतर इस बात का वर्णन हुआ है कि कुबेर, मनु आदि देवता सूर्य के सहचर हैं। सूर्य का एक नाम डिंडी भी है। डिंडी शब्द का अर्थ हेाता है नग्न। इसी क्रम में डिंडी की रहस्मय कथा का वर्णन हुआ है कि किस प्रकार मुनियों की स्त्री का मन कैसे विचलित हेा गया। उन्हें शापग्रस्त होना पड़ा और पुनः सूर्य के द्वारा उनके शाप का उद्धार हुआ।
सत्रहवां अध्याय - सत्रहवें अध्याय में भी दिवाकर की स्तुति की गयी है। पूरा अध्याय ही स्तोत्रात्मक है। एक दंडी के द्वारा यह स्तवन किया गया है। जैसा कि हम जानते हैं दंडी संप्रदाय, शैव संप्रदाय के अंतर्गत आता है। शायद इसीलिए सत्रहवें अध्याय के स्तोत्रांे को माहेश्वर स्तोत्र कहा गया है।
अठारहवाँ अध्याय - अठारहवें अध्याय का नाम देवताख्यापन अध्याय है। इस अध्याय में यह प्रदर्शित किया गया हे कि सूर्य के आस-पास बनी इस सृष्टि में किस प्रकार सौर मंडल की गतिविधियाँ चलती हैं और द्वादशाहित्य एकादश रुद्र, राहु आदि देव उनके विरोधी नक्षत्र तथा अन्य असुर योनियाँ किस प्रकार स्थित हैं। सात लोक भी सूर्य मंडल के अंतर्गत ही हैं। सूर्य ही काल का आधार है। इसलिए विभिन्न मन्वतरों में सूर्य के अंतर से ही मनु आते हैं और अपना शासन स्थापित करते हैं।
उन्नीसवां अध्याय - उन्नीसवें अध्याय का नाम व्युमोत्पत्ति अध्याय है। इस अध्याय में सृष्टि प्रक्रिया का सामान्य रूप से वर्णन किया गया है और इस प्रकार विभिन्न देवताओं एवं सात लोक मेरू आदि पर्वत के उल्लेख के साथ व्योम मंडल का वर्णन हुआ है।
बीसवाँ अध्याय - बीसवें अध्याय में भगवान सूर्य नारायण की गति एवं उसका दिक तथा काल से संबंध का निरूपण संक्षेप में करने के बाद उनके विभिन्न रूपों का विभिन्न त्थानों से क्या संबंध हैं। इसका संकेत किया गया है। इसी क्रम में पुष्कर आदि तीर्थों कीभी चचा्र हुई है।
इक्कीसवाँ अध्याय - इक्कीसवें अध्याय में भगवान भास्कर के रथ का सुंदर एवं सांगोपांग वर्णन मिलता है। सूर्य के तेजस एवं रश्मिमय वैभव का एक रथ के रूप में जो कल्पना की गयी है वह अत्यंत मनोरम है ओैर साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि आदित्य रथ के साधारणीकृत रूप का भौतिक अर्थ क्या है। इस अध्याय का नाम आदित्य रथ वर्णन अध्याय है।
बाइसवाँ अध्याय - बाइसवें अध्याय में चंद्रमा की कला एवं सृष्टि ब्रह्मांड के अन्य ग्रह, नक्षत्रों के साथ उसका वर्णन किया गया है। यह अध्याय अत्यंत ही रोचक है। जिस प्रकार इक्कीसवें अध्याय में भगवान भास्कर के सूक्ष्म भौतिक विस्तार एवं मानवीकृत/साधारणीकृत देवयोनि आदि की चर्चा की गयी है। उसी प्रकार इस अध्याय में चंद्रमा काल के संचालक उपग्रह के रूप में किस प्रकार व्यवहार करते हैं, देवता, ऋषि आदि के रूप में भौतिक शक्तियों को मानवीय रूप दिया गया है। चंद्रमा की शक्ति से जीवन में केसे अनुप्राणित होता है किन-किन तिथियों पर देवगण सोम कला का पान करते हैं। इन सब विषयों का रोचक वर्णन किया गया है।
तेइसवाँ अध्याय - तेइसवें अध्याय में सांब की पीड़ा कथा का भाग बनती है। नारद मुनि के द्वारा सूर्य, चन्द्रलोक के वर्णन के बाद सांब आश्चर्य चकित और चमत्कृत हेाते हैं लेकिन उन्हें यह प्रश्न आंदोलित करता है कि आखिर सूर्य और चन्द्र भी पीड़ित होते ही हैं। नारद जी बताते हैं हिक राहु वस्तुतः सूर्य एवं चंद्र को ग्रहण नहीं कर सकता। ये तो अज्ञानी मनुष्यों की मांस चक्षु का भ्रम है। ग्रहण की अवस्था वास्तविक नहीं है यह तो सम्मोहन द्वारा लोगों को भ्रम में डालने का राहु का प्रयास है। इस अध्याय में सूर्य, चंद्र, ग्रहण की अत्यंत युक्तिसंगत चर्चा की गयी है।
चौबीसवाँ अध्याय - चौबीसवें अध्याय में सांब के द्वारा भगवान भास्कर की स्तुति की गयी है। एक दिव्य स्रोत के द्वारा सांब सूर्य की आराधना करते हैं। सूर्य प्रसन्न होकर वरदान देते हैं कि जिस नगरी में रहकर तुमने मेरी प्रार्थना की है उस का नाम सांब नगरी होगी और मैं तुम्हें हमेशा स्वप्न में दर्शन देता रहूँगा। उस स्तुति और प्रशंसा के साथ सांब का कुष्ठ रोग ठीक हेा जाता है।
पच्चीसवाँ अध्याय - पच्चीसवें अध्याय में पुनः एक सूर्य के स्तोत्र का अवतरण हुआ है। यह स्तोत्र स्वयं भास्कर के मुख से सांब को सुनाया गया है।
छब्बीसवाँ अध्याय - छब्बीसवें अध्याय में रोग से मुक्त सांब चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं। स्नान करने के बाद उन्हें सूर्य की एक अदभुत प्रतिमा पानी में चैरते हुए नजर आती है। वे उसे श्रद्धापूर्यक अपने आश्रम में लाते हैं। सांब और सूर्य प्रतिमा के बीच में वार्तालाप होता है। सांब पूछते हैं कि ऐसी अद्भुत प्रतिमा का निर्माण किसने किया है? प्रतिमा से ही सांब को जानकारी मिलती है कि मेरा यह रूप किसने किया है? प्रतिमा से ही सांब को जानकारी मिलती है कि मेरा यह रूप कल्पवृक्ष के द्वारा शाकद्वीप में निर्मित हुआ है। मेरी पूजा परिचर्या की विधियों का जानकार जम्बूद्वीप में केाई नहीं है। इसके जानकार शाकद्वीप में ही हैं। इसी क्रम में शाकद्वीप, उसमें रहने वाले चार वर्ण, उनकी श्रद्धा, ब्राह्मणों के महत्व की संक्षिप्त चर्चा होती है। सांब को गरुड़ के माध्यम से भगवान भास्कर की प्रतिमा की पूजा के लिए मगों को बुलाने का निर्देश प्राप्त हेाता है।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

सांब पुराण किश्त 2

किश्त 2
    द्वितीय अध्याय - सांब पुराण के द्वितीय अध्याय में मूलतः आदित्य के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इसी क्रम में कुछ सूचनाएँ भी प्राप्त होती हैं। किसी भी देवता की विशिष्टता एवं सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने के लिए अन्य देवताओं, ऋषियों एवं साधनापद्धतियों के साथ प्रांसंगिकता सिद्ध करनी पड़ती है। इसी क्रम में सूर्य की विशिष्टता के बारे में बताया गया है कि आदित्य से ही इस जगत की सृष्टि हुई है और यह संसार अंततः सूर्य में ही विलीन हो जाता है। इसीलिए सूर्य सविता है। सूर्य पथ एवं चंद्र पथ की चर्चा योग शास्त्र में प्रसिद्ध है। सूर्य पथ से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं। उनका पुर्नजन्म नहीं होता। जनकादि अनेक राजर्षियों को सूर्य मंडल में प्रवेश के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति हुई है। द्वितीय अध्याय में इसी प्रकार की बातों का वर्णन किया गया है और सांब पुराण की कथा को सूर्यवंश के आदि गुरु वशिष्ठ के साथ जोड़ा गया है। वशिष्ठ वृहद्वल संवाद के रूप में भी सांब पुराण का प्रकाश हुआ है। यह जानकारी द्वितीय अध्याय से मिलती है।
तृतीय अध्याय - तीसरे अध्याय में कथा का प्रारंभ श्री सांब द्वारा स्थापित उस नगरी से होता है जिसका नाम ही सांब रखा गया है। यह नगरी चंद्रभागा नदी के किनारे बसी हुई थी। सांब की कुष्ठ रोगग्रस्त होने की कथा और भगवान भाष्कर की पूजा से उनके स्वस्थ होने का वृतांत अत्यंत प्रचलित है। सांब की सुंदरता पर कृष्ण की अनेक पत्नियों के मुग्ध होने के बाद भगवान कृष्ण के द्वारा उन्हें शाप दिया जाना और शाप के कारण कुष्ठ रोग का प्रकोप होना यह तीसरे अध्याय की कथावस्तु है।
चौथा अध्याय - सांब के शापग्रस्त होने के बाद यह मामला प्रकाश में आता है कि यदि श्री सांब स्वयं भगवान भास्कर की प्रतिमा स्थापित करें और उसकी विधिवत पूजा अर्चना करें तो उनका रोग दूर हो सकता है। इसी क्रम में आदित्य के बारह रूपों को बताया गया है।
पाँचवा अध्याय - भारतीय संस्कृति में यह जब कभी भी किसी देवता विशेष की पूजा का वर्चस्व काल आया है तब उस पूजा को अखिल भारतीय रूप में दिया गया है। इसी शैली में विष्णु, शिव एवं शक्ति तीनों की अनेक तीर्थ धाम, पीठ ज्योतिर्लिंग आदि स्थापित हुए हैं। इसी शैली में द्वादश आदित्यों का स्थान भी भारत भूमि पर स्थापित हुआ है। पाँचवे अध्याय की कथावस्तु यही हैं।
छठवाँ अध्याय - छठे अध्याय में सांब श्रीकृष्ण की स्तुति करके अपने रोग के निवारण का उपाय पूछते हैं और श्रीकृष्ण निर्देश देते हैं कि तुम नारद जी की प्रार्थना करो और नारद जी ही तुम्हारी शाप मुक्ति का उपाय बतायेंगे। इसी क्रम में भगवान भास्कर के माहात्म्य का संक्षिप्त उल्लेख नारद जी करते हैं और सूर्य लोक का एक संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
सातवाँ अध्याय - सातवें अध्याय में पूर्व की भाँति सूर्य के माहात्म्य एवं वैभव तथा भारतीय संस्कृति में उनके विन्यास की चर्चा नारद जी करते हैं।
आठवाँ अध्याय - सातवें अध्याय में सूर्य के सर्वव्यापित्व की चर्चा करके पुनः उसका विस्तार नारद जी करते हैं। आठवें अध्याय में भी धातु एवं सौर किरणों की कार्य प्रणाली के अनुसार सूर्य के व्यापकत्व का वर्णन किया गया है। बारहों मासों में बारह मासों के साथ बारह आदित्यों का संबंध और उसके शाब्दिक लक्षण आठवें अध्याय में बताये गये हैं।
नवाँ अध्याय - सांब पुराण सूर्य के सभी रूपों का चतुर्दिक संगति के लिए जी जान से तत्पर है। बारह आदित्यों के नाम के साथ उन नामों का व्याकरण संगत व्युत्पत्ति भी नवें अध्याय में बतायी गयी है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि नवें अध्याय में द्वादश आदित्यों के नामों के साथ सूर्य के आचार विचार, क्रिया कलापों के साथ उन नामों की निष्पत्ति सिद्ध की गयी है। कहने का अभिप्राय कि किस प्रकार सूर्य का कौन सा नाम सार्थक है। केवल नाम ही नहीं बल्कि नामों के अनुरूप भगवान भास्कर का स्वभाव एवं व्यवहार भी है।
दशम अध्याय - जिस प्रकार अन्य देवताओं का संबंध उनकी उत्पत्ति, वंश परंपरा, धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। उसी प्रकार सांब पुराण के दसवें अध्याय में आदित्य को अदिति का संतान माना है। और अदिति के अन्य पारिवारिक विन्यासों ने सूर्य एवं उनके बाद के देवी-देवताओं के संबध भी बताये गये हैं। इसी क्रम में प्रह्लाद, बृहस्पति, विरोचन का उल्लेख हुआ है। सूर्य का संज्ञा से संबंध लेकिन पति के रूप में संज्ञा के द्वारा सूर्य के तेज से घबरा कर पितृ कुल में वापस जाना, छाया रूपी पृथ्वी का निर्माण आदि बातों का उल्लेख हुआ है। पुनः सुर-असुर परंपरा में सूर्य के पारिवारिक संबंध की भी चर्चा हुई है। सूर्य एवं सूर्य की पत्नी संज्ञा भी सुख-दुःख से मुक्त नहीं है। विशेषकर संज्ञा की पीड़ा का वर्णन मार्मिक रूप से किया गया है। मानवीकरण होगा तो सुख-दुःख से मुक्ति की जगह प्रेम भावना आदि की बात आयेगी। खराद की पीड़ा से पीड़ित सूर्य के शरीर पर रक्त चंदन के लेप की सार्थकता का आप जो अर्थ निकालें।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सौर तंत्र स्वाध्याय सत्र संपन्न
दिनांक 17 फरवरी 2012 माघ शुक्ल सप्तमी से 21.2.2012 तक गया धाम में सौर तंत्र पर सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण संपन्न हुआ। इसमें श्री मनीष मिश्र ने गणितीय तथा खगोलीय पक्ष को दृश्य श्रव्य माध्यमों की सहायता से  स्पष्ट किया। आचार्य श्री लालभूषण मिश्र ने सनातन धर्मीय कर्मकांड में सौर मास, वर्ष एवं गणना के महत्त्व को समझाया। मुख्य आचार्य रवीन्द्र कुमार पाठक ने सौर तंत्र साधना के प्रयोगिक तथा सामाजिक पक्षों को प्रतिभागियों को स्वयं प्रयोग करा कर अनुभव कराया। इस संक्षिप्त सत्र में नाडी शोधन, मध्य नाड़ी को संध्या काल में संतुलित करने, न्यास का अनुभवात्मक ज्ञान एवं लोक प्रचलित विधियों का समूह में प्रयोग करने की विधि सिखाई। मूल ग्रंथों की उपलब्धता के बारे में भी जानकारी दी गई और स्पष्ट किया गया कि विद्या अभी भी न तो पूरी तरह गुप्त हो गयी है न ही लुप्त। इसे मिलजुल कर सीखने एवं उदारतापूर्वक सिखाने की आवश्यकता है।
आयोजन का खर्च लोगों ने मिलजुल कर उठाया। प्रतिदिन चलने वाले सायंकालीन संध्या के लिये मूल विधि नाड़ी शोधन एवं बिंब धारण के अभ्यास के साथ श्री बालमुकुंद मिश्र के आशीर्वचन के बाद कार्यक्रम भावभीने एवं सादगी भरे माहौल में पूरा हुआ। स्थान व्यवस्था श्री कमल पाठक जी ने चिन्मय वत्सला विद्यालय में करायी। संयोजन का काम श्री विजय पाठक चक्रवर्ती एवं श्री प्रभात कुमार पाण्डेय ने संभाला।
आप इस सूचना का उपयोग कर सकते हैं .

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

सांब पुराण परिचय

सांब पुराण परिचय
(4 किश्तों में)
भारतीय संस्कृति में ब्राह्मणों का स्थान श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए अनेक लोग ब्राह्मण होने के लिए लालायित रहते हैं। कुछ लोग जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं, वे कभी-कभी ब्राह्मणों के प्रति ईर्ष्याग्रस्त हो जाते हैं। इसके विपरीत कुछ ब्राह्मण अपने जाति के अहंकार में ग्रस्त होकर अपने मूल दायित्वों से विचलित हो जाते हैं और अन्य वर्णों के प्रति हीन भावना रखते हैं। ब्राह्मणों में प्रचलित जाति श्रेष्ठता का भाव तब चरम पहुँच जाता है जब वे ब्राह्मणों के बीच भी छुआछूत और आत्म-गौरव के अहंकारी रूप में व्यवहार करते हैं।
उपपुराण प्रायः किसी एक देवता के प्रति ही समर्पित होते हैं। मुद्गल पुराण श्री गणेश की पूजा के प्रति समर्पित है। ठीक उसी प्रकार से सांब पुराण में भगवान भाष्कर, जो आदित्य हैं, उनके बारह रूपों में अर्थात् द्वादश आदित्य के रूप में उनकी पूजा की विधि एवं पूजकों का वर्णन है। कोई भी देवता तब तक पूर्णतः स्वीकृत नहीं हो पाते हैं, जबतक आम आदमी उसे स्वीकार न कर ले। आम आदमी को देवता की मदद केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए ही नहीं चाहिए उसे लोक एवं परलोक दोनों ही स्थानों पर सुख चाहिए। जो देवता लौकिक एवं पारलौकिक दोनों वेशों में सफलता दिला सकें, आम आदमी उन्हें ही पूरी तरह स्वीकार करता है। रोग निवारण एक प्रबल लौकिक आकांक्षा है, उसके बाद संतानोत्पत्ति और सम्पत्ति का स्थान आता है।
इतना ही नहीं जब वे सारी भोग सामग्रियां उपलब्ध हो जाती हैं, तब शत्रुओं से उनकी रक्षा का संकट भी आता है। सांसारिक जीवन में ऐसी कई समस्याएँ आती ही रहती हैं। इन्हीं समस्याओं के निराकरण हेतु तंत्रशास्त्र में मारण, मोहन, स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और विद्वेषण जैसे छह अभिचारों की परंपरा लंबे दौर तक चलती रही। जब सूर्य पूजा अपने चरम पर थी उस समय द्वादशादित्यों के माध्यम से भी अभिचार कर्म किया जाना स्वाभाविक था। सांब पुराण में भी इन सभी अभिचार कर्मों की विधियाँ लिखी हुई हैं।
    बहुत दिनों से सांब पुराण उपलब्ध नहीं था, ऐसा कहना तो ठीक नहीं होगा लेकिन मैं इसे अपना दुर्भाग्य ही समझता हूँ कि पिछले पच्चीस वर्षों के विद्वत्जनों के साथ सत्संग में मुझे एक भी पारंपरिक आचार्य ऐसे नहीं मिले, जिन्होंने सांब पुराण को अपनी नजरों से देखा हों और उसका पारायण किया हो। प्रायः सभी लोग सांब पुराण के नाम से परिचित रहे हैं और कुछ लोगों ने इसके उद्वरणों को यत्र-तत्र पढ़ा है। पता नहीं प्रकाशित होने के बावजूद इस ग्रंथ के नाम जपने में तो लोगों की रुचि रही लेकिन अनेक मूर्धन्य विद्वानों ने भी इसे पढ़ना जरूरी नहीं समझा। इसके कारण भ्रांतियाँ बनी रहीं और लोग मनमानी बातें करते रहे।
    मुझे सौभाग्य से अपने ही घर के पुस्तकालय में सुन्दर मुद्रण में सांब पुराण की प्रति उपलब्ध हो गयी। यह श्री वेंकटेश मुद्रणालय, मुम्बई द्वारा प्रकाशित है। इसी संस्करण को आधार मान कर मैंने यहाँ यह संक्षिप्त विवरणी तैयार की है, ताकि सामान्य संस्कृत ज्ञान वाले लोगों को भी ग्रंथारंभ के पूर्व यह जानकारी मिल सके कि सांब पुराण की मूल सामग्री क्या है और सांब पुराण के पारायण में लोगों की रुचि बन सके।
संपूर्ण बिहार और विशेषकर मध्य बिहार द्वादशादित्यों के मंदिर राज्यों का क्षेत्र रहा है। ऐसे में द्वारशादित्यों की पूजा की, प्रामाणिक विधि का ज्ञान आदित्य भक्तों को होना बेहद जरूरी है। सांब पुराण की भाषा अत्यंत सरल है और इसे समझना सामान्य संस्कृत ज्ञान वाले लोगों के लिए सुविधाजनक है। इसी कारण से मैंने ग्रंथ की काया को बढ़ाने वाले अनुवाद कराने एवं अनुवाद के साथ प्रकाशित करने का विचार नहीं किया। इसमें प्रायः बीज मंत्र हैं और उनकी आनुष्ठानिक विधियाँ हैं। अब बीज मंत्रों का भला क्या अनुवाद होगा और जो इस स्तर का संस्कृत समझ नहीं सकते हैं, उच्चारण नहीं कर सकते हैं वे अनुष्ठान क्या करेगें ? वैसे लोगों क लिए तो यह परिचय ही काफी रहेगा।
वैसे अब चौखंबा प्रकाशन, वाराणसी से हिंदी अनुवाद सहित सांब पुराण प्रकाशित हो गया है।
सांब पुराण की सामग्री - सांब पुराण बहुत ही व्यवस्थित ग्रंथ है। सांब पुराण का पहला अध्याय स्वयं अनुक्रमणिका अध्याय है। इसमें सांब पुराण में वर्णित विषयों की सूची दी गयी है। यहाँ निम्न रूप से उनका उल्लेख किया जा रहा है - प्रत्येक वेदों का अर्थ, स्मृतियों का सार, वर्ण, धर्म एवं उनके आश्रय भूत, भव्य, भविष्य, मंत्रवाद, उत्पत्ति, प्रलय, पूजा की विधि, सामारोंह की विधि एवं पूजा का, पूजा की विधि का सांगोपांग वर्णन, वशीकरण, विद्वेषण, स्तंभन, उच्चाटन आदि अभिचार कर्म प्रतिमा का लक्षण उसकी स्थापना एवं पूजा की विधि, मंडल, अनेक मंडल, क्रिया योग, सिद्धयोग एवं उनका साधन, महामंडल याग एवं उसमें सूर्य की स्थापना। भूमिका, वातोसन एवं इष्ट हेतु पुष्प, धूप आदि की विधियाँ। स्पतमी व्रत का तरीका एवं उपवास की विधि। तदनंतर परोक्षण की विधि और दान का फल। उसके लिए बेला एवं काल का विधान और धर्म विधि। धूप कर्म की विधि एवं जप की विधि, इप्सित अनिप्सित स्वप्न का वर्णन।
    स्वप्नों का वर्णन प्रायश्चित का विधान तथा आचार्य का लक्षण। मंत्र का निर्णय करके सभी शिष्यों की दीक्षा। संक्षेप में विभिन्न प्रकार के स्रोत। जिनके आधार पर अन्य अनेक अनुष्ठान होंगें। यह संक्षिप्त सूची है जो प्रथम अध्याय के रूप में अनुक्रमणिका के रूप में सांब पुराण में वर्णित है। इस सूची से अनेक बातें स्वतः स्पष्ट हो जाती हैं फिर भी यदि कुछ विषयों पर संक्षिप्त प्रकाश डाल दिया जाय तो सांब पुराण के पाठकों को एक पूर्वानुमान सरलता पूर्वक हो जायेगा।
किश्त 2 अगली बार

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

संशोधित कार्यक्रम


ज्ञानामृत
सौर तंत्र परिचय-स्वाध्याय सत्र: माघ शुक्ल सप्तमी से माघ शुक्ल द्वादशी तक
मुख्य विषय - ब्रह्माण्ड की परिकल्पना, हिरण्यगर्भ एवं सविता की अवधारणा, सौर मंडल एवं राशि विज्ञान, देश एवं काल मापन की प्रणालियां एवं सामाजिक जीवन में उनका उपयोग। सूर्य की उपासना, उसकी विभिन्न शैलियां तथा साधना के स्तर। मग ब्राह्मणों एवं सूर्य मंदिरों की भूमिका एवं बदलते सामाजिक संदर्भ, उत्थान पतन तथा मुख्य धारा में सौर तंत्र के अंशों को आत्मसात् किया जाना।
प्रस्ताव/विचारणीय-
1    सूर्य की परंपरा में होने का दावा करने के कारण सौर तंत्र जानने-समझने की हमारी नैतिक जिम्मेवारी है।
2    हम पूर्णतः दक्ष या सर्वज्ञ भले न हों, जानने का प्रयास जरूरी है अतः जिज्ञासु और आंशिक     ही सही, जानकार         लोगों के बीच आपसी स्वाध्याय की दृष्टि से संवाद एवं परिचर्चा भी आवश्यक है।
इसी मकसद से मग मित्र मंडल के सदस्यों ने कुछ तैयारी की है, जो हम आपस में बांटना चाहते हैं। इसके साथ जो कोई भी सौर तंत्र के बारे में सैद्धांतिक या प्रायोगिक ज्ञान रखते हों, उनका भी सादर स्वागत है, हम उन्हें भी सुनेंगे।
इस स्वाध्याय के लिये दो ग्रंथों - सांब पुराण एवं सूर्य सिद्धांत को मूल संदर्भ ग्रंथ माना गया है। चर्चा में अन्य ग्रथ होंगे पर केन्द्र में ये दोनो ही होंगे।
प्रतिभागी - 18 साल से अधिक का कोई भी मग ब्राह्मण स्त्री/पुरुष
समय - अपराह्न 3.00 से सूर्यास्त तक
अवधि -17 फरवरी माघ शुक्ल सप्तमी से माघ शुक्ल द्वादशी दिनांक 21 फरवरी तक
स्थान - चिन्मया वत्सला विद्यालय, खैरात अहमद रोड, पीपरपांती, गया
सत्र विभाजन - प्रतिदिन 2 सत्र होंगे - प्रथम - 3.00 से 4.00 तक तथा द्वितीय - 4.30 से सूर्यास्त तक
प्रथम दिन
प्रथम सत्र    3.00 से 4.00  - परिचय एवं विषय प्रवेश
द्वितीय सत्र  4.30 से सूर्यास्त तक प्रतिदिन- संध्या एवं नाड़ी शोधन का अभ्यास, प्रणायाम एवं इडा-पिंगला को संतुलित करने वाले उपायों का प्रशिक्षण ताकि संध्या काल में मध्य/सुषुम्ना नाड़ी में सूर्योपासना का अभ्यास हो सके। अन्य अभ्यास। 
द्वितीय दिन 3.00 से 4.00  - सौर तंत्र का सनातन धर्मीय कर्मकांड में समावेश।
तृतीय दिन    3.00 से 4.00  - सौर तंत्र की मूल संरचना तथा बाह्य आंभ्यंतर साधना के सूत्र
चतुर्थ दिन    3.00 से 4.00  - सौर तंत्र की मूल संरचना , सौर कुल, जातियां, देवी-देवता, मग ब्राह्मण
पंचम दिन    3.00 से 4.00  - मगों की सौर विद्या में त्ऱुटि के स्थान तथा पुनः प्रतिष्ठा के संभावित उपाय
द्वितीय सत्र - आपसी उद्गार एवं अगले कार्यक्रम की रूपरेखा, समापन।
नियम-
1    समय से कम से कम 20 मिनट पहले पहुंच कर व्यवस्था में सहयोग करें।
2    सामर्थ्य के अनुसार व्यवस्था का भार अवश्य उठावें एवं आचार्यों को समापन पर कुछ न कुछ दक्षिणा अवश्य दें।
3    बिना समझें न तो उपदेश दें न झूठा दावा करें, वह किसी के लाभ के लिये नहीं होता।
4    खुल कर पूछें किंतु मजाक न उड़ायें, यहां कोई भी सर्वज्ञता का दावेदार नहीं है। चर्चा में मानापमान न मानें।
निवेदक- रवीन्द्र कुमार पाठक, अघ्यक्ष, मग मित्र मंडल, मगध बिहार।
नोट- ‘मग मित्र मंडल’ कुछ जिज्ञासु एवं जानकार लोगों की मित्र मंडली है, कोई औपचारिक संस्था या संगठन नहीं।
मुख्य स्रोत व्यक्ति - डॉ. रवीन्द्र कुमार पाठक एवं अतिथि विद्वान, सहयोगी - श्री मनीष कुमार मिश्र
संपर्क- मो. 9431476562 इ मेल - तंअपदकतंानउंतचंजींा064/हउंपसण्बवउ अन्य जानकारी उंहंेंउेातपजपण्इसवहेचवजण्बवउ

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

सौर तंत्र परिचय-स्वाध्याय सत्र

ज्ञानामृत
सौर तंत्र परिचय-स्वाध्याय सत्र   ः माघ शुक्ल सप्तमी से माघ शुक्ल द्वादशी तक
मुख्य विषय - ब्रह्माण्ड की परिकल्पना, हिरण्यगर्भ एवं सविता की अवधारणा, सौर मंडल एवं राशि विज्ञान, देश एवं काल मापन की प्रणालियां एवं सामाजिक जीवन में उनका उपयोग। सूर्य की उपासना, उसकी विभिन्न शैलियां तथा साधना के स्तर। मग ब्राह्मणों एवं सूर्य मंदिरों की भूमिका एवं बदलते सामाजिक संदर्भ, उत्थान पतन तथा मुख्य धारा में सौर तंत्र के अंशों को आत्मसात् किया जाना।
प्रस्ताव/विचारणीय-
1    सूर्य की परंपरा में होने का दावा करने के कारण सौर तंत्र जानने-समझने की हमारी नैतिक जिम्मेवारी है।
2    हम पूर्णतः दक्ष या सर्वज्ञ भले न हों, जानने का प्रयास जरूरी है अतः जिज्ञासु और आंशिक   ही सही जानकार लोगों  के बीच आपसी स्वाध्याय की दृष्टि से संवाद एवं परिचर्चा भी आवश्यक है।
इसी मकसद से मग मित्र मंडल के सदस्यों ने कुछ तैयारी की है, जो हम आपस में बांटना चाहते हैं। इसके साथ जो कोई भी सौर तंत्र के बारे में सैद्धांतिक या प्रायोगिक ज्ञान रखते हों, उनका भी सादर स्वागत है, हम उन्हें भी सुनेंगे।
इस स्वाध्याय के लिये दो ग्रंथों - सांब पुराण एवं सूर्य सिद्धांत को मूल संदर्भ ग्रंथ माना गया है। चर्चा में अन्य ग्रथ होंगे पर केन्द्र ये दोनो ही होंगे।
प्रतिभागी - 18 साल से अधिक का कोई भी मग ब्राह्मण
समय - अपराह्न 2.00 से सूर्यास्त तक
अवधि -17 फरवरी माघ शुक्ल सप्तमी से माघ शुक्ल द्वादशी दिनांक 21 फरवरी तक
स्थान - जिज्ञासुओं की संख्या के अनुसार अभी तय होना है।
सत्र विभाजन - प्रतिदिन 2 सत्र होंगे - प्रथम 2.00 से 3.30 तक तथा     द्वितीय - 4.00 से सूर्यास्त तक
प्रथम दिन
प्रथम सत्र    2.00 से 3.30 - परिचय एवं विषय प्रवेश
द्वितीय सत्र - 4.00 से सूर्यास्त तक प्रतिदिन- संध्या एवं नाड़ी शोधन का अभ्यास, प्रणायाम एवं इडा-पिंगला को संतुलित करने वाले उपायों का प्रशिक्षण ताकि संध्या काल में मध्य/सुषुम्ना नाड़ी में सूर्योपासना का अभ्यास हो सके। अन्य अभ्यास। 
द्वितीय दिन 2.00 से 3.30 - सौर तंत्र का सनातन धर्मीय कर्मकांड में समावेश।
तृतीय दिन    2.00 से 3.30 -    सौर तंत्र की मूल संरचना तथा बाह्य आंभ्यंतर साधना के सूत्र
चतुर्थ दिन    2.00 से 3.30 -    सौर तंत्र की मूल संरचना , सौर कुल, जातियां, देवी-देवता, मग ब्राह्मण
पंचम दिन    2.00 से 3.30 - मगों की सौर विद्या में त्ऱुटि के स्थान तथा पुनः प्रतिष्ठा के संभावित उपाय
द्वितीय सत्र - आपसी उद्गार एवं अगले कार्यक्रम की रूपरेखा, समापन।
नियम-
1    समय से कम से कम 20 मिनट पहले पहुंच कर व्यवस्था में सहयोग करें।
2    सामर्थ्य के अनुसार व्यवस्था का भार अवश्य उठावें एवं आचार्यों को समापन पर कुछ न कुछ दक्षिणा अवश्य दें।
3    बिना समझें न तो उपदेश दें न झूठा दावा करें, वह किसी के लाभ के लिये नहीं होता।
4    खुल कर पूछें किंतु मजाक न उड़ायें, यहां कोई भी सर्वज्ञता का दावेदार नहीं है। चर्चा में मानापमान न मानें।
निवेदक- रवीन्द्र कुमार पाठक, अघ्यक्ष, मग मित्र मंडल, मगध बिहार।
नोट- ‘मग मित्र मंडल’ कुछ जिज्ञासु एवं जानकार लोगों की मित्र मंडली है कोई औपचारिक संस्था या संगठन नहीं।
संपर्क- मो. 9431476562 इ मेल ravindrakumarpathak064@gmail.com


बुधवार, 9 जनवरी 2013

शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज, परिवार मिलन समारोह, गया नगर
स्थान-प्रकृति वाटिका, खटकाचक, दिनांक- 23 दिसंबर 2012, दिन रविवार
परिवार मिलन कार्यक्रम के आमद खर्च का व्योरा
पहले तो इस मिलन कार्यक्रम को पूरी तरह विकेन्द्रित सहयोग पद्धति पर आधारित कर मनाने का निर्णय हुआ था लेकिन संज्ञा समिति के लोगों एवं अन्य के प्रस्ताव पर लगभग पूर्ण बहुमत से 5 सदस्यों की संयोजन समिति के नियंत्रण में आपसी चंदे पर मनाने का निर्णय हुआ। समिति के संदस्य चुने गये- 1 सर्व श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र, खरखुरा, इस समिति के संयोजक चुने गये। सदस्य गण- 2 कमल पाठक, खरखुरा  3 देवेन्द्र कुमार पाठक, अघ्यक्ष संज्ञा समिति,
4 राजंेश कुमार मिश्र, बागेश्वरी, 5 डॉ प्रमोद कुमार पाठक। तुरत वहीं पर चंदा आया-.......................।
1 सर्व श्री राधामोहन मिश्र    255
2 संजय कुमार मिर        101
3 उपेन्द्र कुमार पाठक        101
4 कमल पाठक             500
5 मजोज कुमार मिश्र        500
6 राजकुमार वैद्य            251
7 बैद्यनाथ मिश्र            251
8 अरुंजय कुमार पाण्डेय        101
9 अशोक कुमार मिश्र        151
10 गिरिजानंदन मिश्र        101
11 हरिनारायणमिश्र        501
12 प्रमोद कुमार पाठक        151
13 अंनंत कृष्ण            100
14 प्रमोद मिश्र            055
15 अमित कुमार मिश्र        251
16 राजेश कुमार मिश्र        251
17 रवीन्द्र मिश्र            151
18 अमृतेश कुमार मिश्र        501
19 देवेन्द्र नाथ मिश्र        500
            कुल    4777.00         इसे श्री देवेन्द्र नाथ मिश्र को सौंपा गया।
दिनांक 4 जनवरी को बैठक हुई। इसमें प्रस्तुत विवरण निम्न है-
1 कुल फुटकर चंदा            रु 4777 एवं 816
2 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक         रु 2000
                कुल.    रु 7589
परिवार मिलन कार्यक्रम के दिन प्राप्त राशि
1 सर्व श्री राजंेन्द्र कुमार पाठक     200
2 अमृतेश कुमार मिश्र        100
3 धनंजय पाठक            011
4 बाल शशि मिश्र        101
5 संजय कुमार मिश्र        101
6 रमाकांत पाठक        050
7 मुरारि मिश्र            101
8 ब्रजभूषण पाण्डेय        101
9 चंदन कुमार मिश्र        051
            कुल     816.00
रमेश कुमार पाठक बैंगन 20 किलो
श्री देवेन्द्र कुमार पाठक ने घोषणा की थी कि चंदे के बाद जो भी घटेगा उसकी भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे। स्थान व्यवस्था एवं अन्य खर्च (भोजन के अतिरिक्त) में चंदे से शेष की भरपाई रवीन्द्र कुमार पाठक करेंगे।
खर्च   
क डॉ प्रमोद कुमार पाठक एवं संज्ञा समिति मंडली द्वारा लिट्टी आदि भोजन मद में रु 11480 ( विवरण अनुपलब्ध)
ख श्री मनीष मिश्र द्वारा माइक स्पीकर बैटरी आदि मद में                 रु   740
ग श्री प्रभात कुमार पाण्डेय,  प्रतिनिधि र.कु.पाठक चाय, फलाहार, प्लेट, ग्लास, आदि
    फुटकर सामग्री मद में प्रस्तुत विवरण के अनुसार                 रु 1140
                                    कुल      रु 13360
1 श्री देवेन्द्र कुमार पाठक चंदे के बाद घटी राशि रु 5771 की भरपाई वे निजी तौर पर करेंगे।
2 श्री रवीन्द्र कुमार पाठक द्वारा अन्य मद की राशि रु 740 की भरपाई निजी तौर पर कर दी गई।
स्थान सहयोग रवीन्द्र कुमार पाठक, बस सहयोग देवेन्द्र कुमार पाठक निजी खर्च पर, व्यवस्थापकों द्वारा पेट्रोल खर्च
इस पेज की 40 प्रतियां बना कर सक्रिय सदस्यों में वितरित की गईं और इसे magasamskriti.blogspot पर सार्वजनिक कर दिया गया।
रवीन्द्र कुमार पाठक, दिनांक 06.जनवरी .2013