मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

गोत्र पुर की एक नई सूची

गोत्र पुर की एक नई सूची आई है। फेसबुक का लिंक है-
https://www.facebook.com/suryaparishad/posts/1409690936000401?pnref=story

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

सूर्य उपासना/ मग इतिहास में महाश्वेता प्रसंग

सूर्य उपासना/ मग इतिहास में महाश्वेता प्रसंग
मेरे अंदाज से अनेक लोग इस बात से लगभग अपरिचित होंगे। प्रख्यात सूर्य मंदिरों का अध्ययन करते समय पुराविद् कनिंघम और उनके पंडित सहयोगी पं. हर प्रसाद शास्त्री को भी यह बात समझ में नहीं आई थी। अपने रिर्पोअ में तो वे महाश्वेता की प्रतिमा को पहवान भी नहीं सके थे। यह बात देव वरुणार्क रिपोर्ट में दर्ज है।
मैं ने पुरातत्त्व का अध्ययन उलटे क्रम से शुरु किया क्योंकि अ्रग्रेजी में लिखित सैकड़ों पृष्ठों की जगह संस्कृत पढ़ना मेरे लिये आसान था। जब मैं ने मूर्ति शास्त्र के ग्रथ पढ़े तब भी समझ साफ नहीं हुई लेकिन जैसे ही सांब पुराण पढ़ा बात साफ हो गई कि ‘‘श्री महाश्वेतयों स्थानं पुरस्तादंशुमालिनः’’। मैं ने 1980 के आसपास तक जीवित आरा, पटना, बनारस, इलाहाबाद और गया के तत्कालीन अनेक विख्यात पंडितों से संपर्क कर महाश्वेता के बारे में जानने का प्रयास किया लेकिन कोई उत्तर नहीं पा सका और आज भी मेरी जिज्ञासा वैसी ही है। 
पहले नेट पर इतनी सामग्री आसानी से नहीं मिलती थी न ही चर्चा हो पाती थी। पुस्तकालय और विद्वान ही सहारा थे।
महाश्वेता कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। उनके नाम का आकर्षण बहुत अधिक है। मगध के सबसे संस्कृत महाकवि बाणभट्ट की कादंबरी कथा की नायिका महाश्वेता हैं। पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध उपन्यास की नायिेका भी महाश्वेता है। प्रसिद्ध बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी आज भी एक हस्ती हैं।
मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महायवेता की प्रतिमा का सूर्य मंदिरों में ठीक सूर्य के सामने प्रतिमा लगाने का क्यों प्रावधान है। पुराने देवता को हटा कर परिवर्तित सूर्य मंदिरों पर यह बात लागू नहीं होती। इतना ही नहीं चाहे सौर यज्ञ हो, दीक्षा हो या रथ यात्रा का प्रावधान हो महाश्वमता की भी पूजा होगी और दनके मंत्रों का जप भी होगा। यह प्रावधान सांब पुराण के अध्याय सं. -30, 32, 38 तथा भविष्य पुराण के ब्राह्मपर्व, अध्याय सं.- 92 एवं अन्यत्र भी आप देख सकते हैं। 
इस संदर्भ में कोई भी च्यक्ति स्वयं या किसी अन्य विद्वान के माध्यम से कुछ जानकारी देंगे तो उनकी बड़ी कृपा होगी। मैं उसे उन्हें स्रोत मान कर उल्लेख करूंगा। सहयोग की आशा के साथ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

आर्थिक पक्ष की चुनौतियां

मुझे अपनी जाति में 3 प्रकार के लोग मुख्य रूप से मिलते हैं। 
पहले वे, जो वर्तमान समय की आर्थिक चुनौतियों से संघर्ष करने में सक्षम है और व्यवसाय या सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ते जा रहे हैं। इनमें कुछ तो जाति के प्रति लगाव रखते हैं और संवेदनशील है लेकिन अनेक अपने को भिन्न किश्म का या विशिष्ट मानने लगे हैं। कई बार तो जाति की बात से भी चिढ़ते हैं। उन्हें जाति तब याद आती है जब विवाह करना हो या अपने पेशे में शाकद्वीपीय ब्राह्मण के रूप में अपमानित या पेशान किये जाते हैं। पहले तो अखिल भारतीय ‘‘शर्मा’’वाद चला। अब परंपरागत उपाधि तक को हटाना एक आम चलन जैसी हो गई है। 
इन्हें संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है।
दूसरे प्रकार के लोग वे हैं, जो कठिन संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं। इनमें से कुछ सफल भी हो रहे हैं लेकिन अधिकांश अभी भी सुविधाजनक शार्टकट और नकली अहंकार तथा दिखावे में उलझे हुए हैं। ये शादी विवाह में अधिक कर्ज में डूब कर घर की जमा पूंजी नष्ट कर रहे हैं। इसके साथ अत्यधिक ईर्ष्या के कारण किसी भी क्षेत्र के सफल व्यक्ति से संपर्क करने तक को तैयार नहीं होते। इनमें से अधिकांश सुविधाजनक प्रवेश वाले कारोबारी तथा पहचान क्षेत्र को पकड़ते है, जैसे - वकालत, मार्केटिंग, नेटवर्किंग, कवि होना, बीमा एजेंट, रियल इस्टेट एजेंट, गृह उद्योग लगाना (विपड़न हीन), पूजापाठ और ज्योतिष का काम। सच यह है कि उपर्युक्त क्षेत्रों में सफलता के लिये काफी प्रतिभा, श्रम एवं धैर्य की आवश्यकता है जबकि ये लोग इसे झटपट बड़ा बनने के साधन या हारे को हरिनाम मान कर अपनाते हैं।
इनकी सामाजिक मनोचिकित्सा की आवश्यकता है, उनका मनोबल बढ़ाना जरूरी है।
तीसरे स्तर पर वे लोग हैं, जो परम असहाय हैं। भयानक गरीबी में सब कुछ लुटा कर मरता क्या न करता कि हालात में हैं। इनकी संख्या दुर्भाग्य वश बढ़ती जा रही है। इनकी किसी प्रकार की निंदा करने की जगह अनुभवी लोगों के संरक्षण में व्यापक अभियान चला कर इन्हें संकट से निकालना चाहिये। कुछेक निशुल्क स्कूल/प्रशिक्षण केन्द्र खोलने की जरूरत है, जहां आवासीय सुविधा के साथ समाज की मुख्य धारा में एक गरीब आदमी की तरह  ही सही रहने भर की शिक्षा दीक्षा तथा आगे के संघर्ष हेतु राश्ते का तो पता चल सके। कम से कम इनकी अगली पीढ़ी को तो बचाया जा सके। निःशुल्क विवाह, जनेऊ आदि का आयोजन किया जा सकता है।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

सामाजिक विकास सूत्र की तलाश

हम केवल अकेले अल्पसंख्यक नहीं हैं

जातीय संख्या की दृष्टि से हम केवल एक अकेले अल्पसंख्यक नहीं हैं। यह अल्पसंख्यक वाला रोना मुझे जंचता नहीं है। हिंदू समाज की भी कई छोटी संख्या वाली जातियां सफल हो रही हैं। 
पारसी तो सबसे अल्पसंख्यक, सफल एवं नेतृत्वकारी भूमिका में हैं। राजनीति को छोड़ सभी क्षेत्रों में विशिष्ट स्थान पर हैं। वे जब पहली बार भारत आये थे तो कहा था हम भारतीय समाज में आंटे में नमक की भांति रहेंगे। पता ही नहीं चलेगा कि हम यहां हैं भी और आपसे अलग हैं।
मेरी समझ से हमारी मूल समस्या यह है कि हमारे पास वर्तमान समय के अनुरूप भारतीय समाज में पूर्ववत विशिष्ट या कम से कम सामान्य से बेहतर स्तर पर रहने की सोच नहीं है। 
व्यक्ति की दृष्टि से बेहतर स्थानों पर अनेक लोग सफल हैं लेकिन उनके पास भी समग्र जातीय कल्याण की शायद दृष्टि नहीं है या भावना नहीं है अथवा कुछ और समस्या है। अभी मेरे पास भी ऐसी दृष्टि और योजना नहीं है, जिससे व्यापक समाज का कल्याण हो सके। तलाश जारी है।
मेरी निजी सफलता में मेरे परिवार का भी पूरा योगदान है अतः मैं उसे सामाजिक विकास का सूत्र नहीं कह सकता क्योंकि सभी लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि एक समान नहीं होती।

इसके बावजूद मैं कुछ उदाहरण क्रमशः रखूंगा कि कैसे पर्दे के पीछे रह कर भी अपनी जाति के लोगों ने जातीय कल्याण के व्यापक काम किये। स्वाभाविक है कि उनके काम से लाभान्वित लोग भी न उनके काम को जानते हैं न ही उनके प्रति कृतज्ञ होने का सवाल है। चर्चित तो सम्मेलन ही रहे और जातीय संगठन के नेता गण, जिन्होंने बहुत काम किया। मेरा यह मंतब्य केवल दक्षिण बिहार के बारे में है। राजस्थान की स्थिति इससे भिन्न रही है।

समस्या की जानकारी के लिये इसे भी देखें--
http://magasamskriti.blogspot.in/2012/11/normal-0-false-false-false-en-us-x-none_27.html

सोमवार, 26 जनवरी 2015

ताकि हौसला बना रहे

ताकि हौसला बना रहे
1 शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज के लोगों से मेरा सादर निवेदन है कि सभी लोगों को खुले दिल और दिमाग से समाज की समस्या और उसके समाधान पर सोचना चाहिये साथ ही समाज के लिये जब कोई भी संस्था या कुछ लोगों की मंडली कुछ करती है, उसकी सच्ची समीक्षा होनी चाहिये तथा उन्हें पूरा सहयोग दिया जाना चाहिये ताकि हौसला बना रहे।
2 बिरादरी के हित में काम करने वाले लोग अक्सर कुछ दिनों बाद थक, उदास हो कर बैठ जाते हैं और समाज की शिकायत करते रहते हैं। इसी तरह शाकद्वीपीय ब्राह्मण समाज के लोग भी कई बार हर काम में केवल नुक्श निकालते हैं और यह शिकायत करते हैं कि बस इतना ही? यह भी कोई काम है? इससे क्या होने वाला है? इन दोनो अतिवाद से बचना जरूरी है ताकि समाज और समाज के लिये छौटा या बड़ा कोई भी काम करने वालों का हौसला बना रहे।
3 जो लोग कोई भी संस्था या कुछ लोगों की मंडली बना कर समाज के काम के मैदान में उतरते हैं, वे भी प्रायः अति उत्साह के कारण भ्रम में रहते हैं और सारे कामों को अकेले ही करने का बीड़ा उठाने लगते हैं। समाज के चतुर और असंवेदनशील लोग उनकी अतिरंजित प्रशंसा कर उन्हें भ्रम में डाल देते हैं। सच यही है कि अपनी रोजी रोटी के बाद समाज के काम के लिये समय निकालना बड़े त्याग का काम है और इसकी एक सीमा है। किसी से भी अधिक अपेक्षा करना उसे बरबाद करने जैसा है। अतः दोनों पक्षों, समाज तथा इसके लिये काम करने वालों को सावधान रहने की जरूरत है, ताकि हौसला बना रहे।
4 अक्सर देखा जाता है कि संस्थाएं और संगठन फैलने की जगह सिमटते-सिमटते कुछ चुनींदा लोगो की मंडली बन कर रह जाते हैं। इसे हर हाल में रोका जाना चाहिये। नये नये लोगों को सेवा के काम में समय देना चाहिये और पहले से चल रही मंडली को उन्हें प्रेम पूर्वक स्वीकार करना चाहिये ताकि हौसला बना रहे।
5 सभी कामों में सबकी न रुचि होती है, न क्षमता। पहले से चल रहे किसी संस्था-संगठन को यदि किसी दूसरे की बात पसंद न हो तो वे विरोध करने लगते हैं और अपमान महसूस करते हैं। उसे समाज विरोधी काम तक कहने लगते हैं। यह संकीर्ण दृष्टि है कि न करेंगे, न करने देंगे। मेरे/हमारे अतिरिक्त किसी को कुछ करने नहीं देना है। मेरा/हमारा वर्चस्व ही रहना चाहिए। इसे अपने एवं समाज के हित में शीध्र त्याग कर उत्साही लोगों को सुनना एवं अपने मंतब्य तथा सुधार के सुझाव के साथ यथा शक्ति सहयोग करना चाहिये ताकि हौसला बना रहे।
6 समाज के लिये किये जाने वाले काम अनेक हैं, कुछ तो तुरत आपत्कालीन मदद वाले हैं, उसके लिये किसी संस्था या संगठन की अनिवर्यता नहीं है न उसके लिये किसी का संकट काल टल सकता है। जो जहां हों, वहीं मदद करें ताकि अन्य को भी प्रेरणा मिले और भले लोगों का हौसला बना रहे।
7 सूर्य सप्तमी पूजा, परिवार मिलन, प्रतिभा खोज एवं उनका सम्मान, आपात सहायता, वैवाहिक सूचना, आपसी कलह में समझौता, संस्कृत- संस्क्ृति प्रशिक्षण, रोजगार परक प्रशिक्षण आदि करने लायक अनेक काम हैं। इन्हें इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि एक मंडली, जो काम कर रही है वही सारे काम करे। मुझे इस बात में कोई बुराई नहीं लगती कि अलग अलग कामों के लिये अलग अलग मंडिलियां सक्रिय रहें और सभी दूसरे को सहयोग दें। कोई न थक कर बैठ जाए, न ही कोई खड़ा ही न हो सके। वास्तविकता को स्वीकार करना जरूरी है ताकि हौसला बना रहे।
8 अघोषित रूप से किसी आयोजक द्वारा उसके अच्छे आयोजन के बीच ही किसी राजनैतिक दल, व्यापारी संस्थान या अन्य जातीय संस्था या संप्रदाय के लोगों को लाभान्वित बनाने के खेल के कारण लोग भीतर ही भीतर भड़क जाते हैं। ऐसा करना उचित नहीं ताकि पारदर्शिता और विश्वास के साथ सही लोगों का हौसला बना रहे।
9 धीरे-धीरे आयोजनों को स्वावलंबी और सरल बनाने का प्रयास करना चाहिये ताकि लोग समाज के काम के सपने को साकार करने के लिये नये नये लोग आगे आयें और हौसला बना रहे।
मैं भी लंबे समय से कई सामाजिक कामों में लगा रहा हूं। मैं ने भी अनेक प्रकार के सफलता-विफलता के अनुभव पाये हैं। अपनी समझ, अनुभव तथा आगे की संभावना को देखते हुए अपना विचार आप लोगों के सामने रख रहा हूं। आशा है, आप सभी इस पर ध्यान देंगे और मुझे भी सलाह देंगे।
रवीन्द्र कुमार पाठक, मो- 9431476562

सोमवार, 19 जनवरी 2015

सूर्य सप्तमी और सूर्य पूजा

सूर्य सप्तमी व्रत-पूजा-उत्सव संदर्भ कथा
पिछले वर्ष मैं ने सूर्य सप्तमी के अवसर पर की जाने वाली पूजा को सांब पुराण के अनुसार किये जाने का सुझाव दिया था, जो अपनी परंपरा का मूल ग्रंथ है। इसमें विस्तार से सूर्य साधना की अनेक विधियां दी गई हैं। जो भी संस्था/संगठन इसे पसंद करें उनके लिये विवरण नीचे उपलब्ध है।
माघ शुक्ल सप्तमी के दिन व्रत एवं पूजा के साथ उत्सव मनाने का वर्णन पुराणों में मिलता है। भविष्य पुराण और उसके उप पुराण सांब पुराण में सूर्य सप्तमी का वर्णन है, उसमें भी केवल सूर्य संबंधी होने के कारण सांब पुराण में यह विषय विस्तृत रूप से वर्णित है।
यह व्रत वस्तुतः 2 दिनों षष्ठी और सप्तमी मिला कर मनाने का प्रावधान है, जिसे बाद में केवल षष्ठी या केवल सप्तमी के दिन भी मनाने का विकल्प दिया गया। षष्ठी के दिन व्रत और सप्तमी के दिन उत्सव का स्वरूप होने से कालांतर में सप्तमी वाला ही अधिक प्रचलित रहा। इसे भानु सप्तमी एवं रथ सप्तमी भी कहा गया है। मूलतः कहा जाय तो यह रथ सप्तमी है। इस अवसर पर सूर्य के रथ के निर्माण और रथ यात्रा का पहले प्रचलन था, जिसका विधान सांब पुण में सूर्य सप्तमी पूजा के रूप में है। इस अवसर पर रथ निर्माण से ले कर रथ यात्रा निकालने तक की चलन रही, साथ ही सूर्यमंडल के निर्माण के बाद उसमें सौर तंत्र साधना पंरपरा में दीक्षा भी दी जाती थी। बाद में जब लोगों ने सौर तंत्र में दीक्षा ले कर साधना करना छोड़ दिया क्योंकि यह साधना पद्धति मुख्यतः योग मार्ग का होने के कारण तुलनात्मक रूप से कठिन होती थी साथ ही मंदिरों से जब चढ़ावा बिना मिहनत मिले तो साधना कौन करे का भाव भी आ गया। मंदिर के प्रबंधन में मगों की इतनी दक्षता थी कि अन्य संप्रदाय के लोग भी इन्हें कहीं पुजारी, कहीं प्रबंधक नियुक्त करने लगे थे।
सूर्य मंदिरों की संपत्ति पर दूसरों के कब्जे और मग बिरादरी की उदासीनता के कारण बहुत दिनों तक रथ यात्रा एवं सूर्य सप्तमी बंद रही। कुछ लोग इसे अचला सप्तमी के रूप में मनाते रहे। इसमें किसी जाति विशेष की सीमा नहीं रही। इस प्रकार रथ सप्तमी का संदर्भ तो लोग भूल ही गये। यहां तक कि जहां सूर्य मंदिर हैं वहां भी न तो रथ निर्माण होता है न रथ यात्रा निकाली जाती है।
इसके बाद जब बिरादरी एकता एवं संगठन के प्रयास शुरू हुए तब सूर्य सप्तमी को पूरे भारत में शाकद्वीपी लोगों की वार्षिक पूजा के रूप में स्वीकार किया गया। इसके बाद एक दिवसीय सूर्य सप्तमी और सूर्य पूजा की चलन शुरू हुई लेकिन अन्य ग्रंथों के आधार पर, जब कि सांब पुराण में पूरी पूजा विधि दी हुई है। इसी में आंशिक कालोचित संशोधन कर सूर्य सप्तमी व्रत पूजा करना परंपरा के अधिक करीबी है।
सांब पुराण शाकद्वीपियों का सर्वाधिक विस्तृत और पारंपरिक ग्रंथ है। अतः अन्य जो करें शाकद्वीपी लोगों को सांब पुराण पर भरोसा करना चाहिये। सूर्य सप्तमी/अचला सप्तमी व्रत के अनेक लाभ बताये गये हैं, जिनमें एक लाभ यह है कि इस दिन किया गया कार्य हमेशा स्थाई होता है।
सांब पुराण अध्याय, 38, 55, एवं अन्य पर आधारित


श्री शशि रंजन मिश्र से अनुरोध है कि वे सांब पुराण वाला लिंक एक बार फिर से पेस्ट कर दें या अध्याय 38 को डॉक्युमेंट फार्म में उपलब्ध करा दें ताकि लोग आसानी से प्रिंट निकाल कर उसका उपयोग कर सकें।
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बुधवार, 14 जनवरी 2015

सावधानी का आग्रह

एक सुखद ऐतिहासिक सूचना एवं सावधानी का आग्रह
भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न ब्राह्मणों ने समय समय पर ईशाई धर्म को स्वीकार किया। कोलकाता तथा मद्रास में यह काम यूरोपीय प्रभाव या अंगरेजी सरकार के प्रलोभन वश हुआ। गोआ में जबरन धर्मांतरण कराया गया। सौगाग्य से बंगाल के कोलकाता में रहने के बावजूद ‘‘किसी शाकद्वीपी ने ईशाई धर्म नहीं अपनाया’’, यह मानना है ईशाई मिशनरियों का। देखें वेबसाइट http://joshuaproject.net/people_groups/19974/IN
इस तथ्य ने ईशाई मिशनरियों में यह चुनौती पैदा की है कि किसी प्रकार शाकद्वीपी ब्राह्मणों को ईशाई बनाया जाय। इसके लिे पहला उपाय सोचा गया है कि उन ईशाइयों को इनके संपर्क में लाया जाय जो पहले ब्राह्मण थे। ऐसे लोगों से सावधान रहें।